रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमस्तरङ्गः ७५ के लिये नाये हुए पारद को यदि औषधिकार्य में लाया जाय तो इसमें अशुद्धि बहुत सम्भावनीय है । नवीन अन्वेषकों का विचार है कि बहुत सम्भव है कि प्राचीनकाल में भी व्यापारी लोग चपल के मिश्रक (Alloy Of Bismith) बनाते हों । आयुर्वेद में लिखे चपलधातु के गुणों में भी यह लिखा है कि चपल रस बन्धकारक है । “चपलो वृष्यो रसबन्धकारकः ।” अतः चपलधातु मिश्रित पारद में चपल दोष का होना स्वाभाविक दोष हो सकता है । असह्याग्निदोष--नवीन अन्वेषकों के अनुसार पारद के खनिजों में कुछ ऐसे खनिजों का पता लगा है जो उड़नशील निश्चित हुए हैं । जैसे ऑक्सिजन गैस, लवणगैस (Chlorin) आदि । इन खनिजों की विद्यमानता में पारद अपने तापक्रम के पूर्व ही उड़ने लगता है । अर्थात् जो शुद्ध पारद ३५७ डिग्री के तापक्रम पर उड़ने लगता है यदि वह किन्हीं खनिजों की विद्यमानता से अल्प तापक्रम पर ही उड़ने लगे तो उसमें असह्याग्नि दोष माना जाता है । गिरिदोष-पर्वत के जिस अंतराल से पारद बाहर आता है उसमें पाई जानेवाली विकृतियों तथा दोषों के सम्पर्क को गिरिदोष कहा जाता है। अतः पारद के संबंध में पर्वतों तथा स्थानों का भी पूर्ण निश्चय करना चाहिये कि अमुक पर्वत में अमुक धातु या विष अधिक पाया जाता है, अतः इस स्थान या खान के पारद में यह विकृति हो सकती है । इस विषय की ओर ध्यान देकर उस ( पारद ) का ग्रहण करना गिरिदोष का ज्ञान है । पारदस्य सप्तकञ्चुकाः भेदी द्रावी मलकारी ध्वाङ्क्षी पर्पटिका च सा । अन्धकारी पाटनिका कञ्चुकाः सप्त कीर्तिताः ॥१०॥ अथ सप्त कञ्चुकाः-कञ्चुकवद् बहिरावरणे समाः । तन्नामानि यौगि- कानि ध्वाङ्क्षी, काकवत् , कृष्णवर्णत्वात् , पाटनिका, स्फोटहेतुः ॥ १० ॥ आ.टी.-पारद में उक्त दोषों के अतिरिक्त भेदी, द्रावी, मलकारी,ध्वांक्षी, पर्पटिका, अंधकारी, पाटनिका, ये सात कंचुक दोष भी माने जाते हैं ॥१०॥ सप्त कंचुकानां परिचयः धातवो रससंश्लिष्टा यदा विष्णुपदामृतम् । गृह्णन्ति हि तदा तेषां कश्चिद् भागोऽवशीर्यते ॥ ११ ॥ ततश्चूर्णत्वमापन्ना रसमाच्छादयन्ति ते । तेनावरणसाम्येन धातवः सूतसंगताः ॥ १२ ॥