भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पञ्चमस्तरङ्गः ७७ शुद्धस्तु पारदः सत्यं पीयूषसोदरः सर्वथाऽमृततुल्यः, सदोषस्तु अपरो यम इति प्रभूतपीडाकर इत्यर्थः ॥ १४-१६ ॥ आ.टी.—पारद में जो स्वाभाविक दोष और कञ्चुक दोष पाये जाते हैं उनको हटाने के लिये पारद का सामान्य शोधन करना आवश्यक है । शुद्ध पारद सेवन करने पर निश्चित ही अमृत के समान गुणकारी होता है, इसके विपरीत दोषयुक्त पारद दूसरे यमराज के समान घातक होता है । अतः पारद की शुद्धि के लिये अच्छे परिचारकों के साथ सब पारदशोधन सामग्री जुटाकर इसकी शुद्धि करनी चाहिए ॥ १४-१६ ॥ शोधनार्थे रसपरिमाणम् पलानां शतकं ग्राह्यं तदर्धार्धमथापि वा । पलानां दशकं वापि पञ्चकं वा पलोन्मितम् ॥ १७ ॥ पलान्यूनो न संग्राह्यः संस्कारार्थे रसो बुधैः । बहुप्रयाससाध्यत्वाल्लाभाभावाच्च निश्चितम् ॥ १८ ॥ शोधनाय रसपरिमाणं बहुप्रयाससाध्यस्य फललाभाय ॥ १७-१८ ॥ भा.टी.—शोधन करने के लिये पारद को सौ पल, पचास पल, या पच्चीस पल, या दस पल, पाँच पल अथवा कम-से-कम एक पल तक परिमाण (तौल) में लेना चाहिए । किन्तु समझदार वैद्यों को एक पल से कम परिमाण में शोधन के लिये पारा नहीं लेना चाहिए । क्योकि इतने कम पारद के लिये भी प्रयत्न परिश्रम सामग्री साधन वही जुटाने होगे जो सौ पल पारद के लिये जुटाने पड़ते हैं । इतने परिश्रम के बाद आर्थिक दृष्टि से कोई विशेष लाभ नहीं रहता है ॥ १७-१८ ॥ अथ समय शोधनम् सुदिने शुभनक्षत्रे स्वेष्टदेवं च शङ्करम् । भैरवं चापि सम्पूज्य रसकर्म समाचरेत् ॥ १६ ॥ समयशोधनमन्तरायप्रतीकाराय अभीष्टसिद्धये च । सुदिने व्यतीपातादि- वर्जिते शुभनक्षत्रे पुष्यादौ ॥ १६ ॥ भा.टी.—ज्योतिःशास्त्रानुसार अच्छे दिन अच्छे नक्षत्र में अपने इष्ट देवता तथा शिवजी और भैरव की प्रथम पूजा करके पारदशोधनादि कर्म करने चाहिए ॥ १६ ॥