रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६० रसतरङ्गिणः भा.टी.-पातन करने के निमित्त कही हुई औषधियों के साथ पारद को मर्दनकर यन्त्र में रखकर ऊर्ध्व अधः तथा तिर्यक् रूप से पातन कर लेने को पातन कर्म कहते हैं । इन कर्मों के द्वारा पारद के नाग और वंगदोष नष्ट किये जाते हैं। क्योंकि धातु उड़कर ऊपर नहीं लगती है ॥ ६६ ॥ तत्र ऊर्ध्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः स्वर्जिका खलु यवाग्रजं तथा रामठं लवणपञ्चकान्वितम् । अम्लवर्गगदितैस्तु भेषजैः संयुतं रसवरं विमर्दयेत् ॥७०॥ स्थापयेदिह सुयुक्तितो भिषक् पारदं विहितकल्कसंयुतम् । ऊर्ध्वपातनकयन्त्रमार्गतः पातयेदिह रसेश्वरं भिषक् ॥७१॥ ऊर्ध्वपातनस्य प्रथमः प्रकारः-रामठं हिंगु । सुयुक्तित इत्यधःपात्रे मर्दितः सकल्कः पारदः स्थाप्यः । शिष्टं सुगमम् ॥ ७०-७१ ॥ भा.टी.-सजीखार, जवाखार, हींग, पाँचों नमक तथा अम्लवर्गोक्त औषधियों के साथ पारद को मर्दनकर इस कल्क को हाँडी में भरकर ऊर्ध्व- पातन यन्त्र से ऊपर उड़ा लें । पारद ऊपर लगा हुआ मिलेगा ॥ ७०-७१ ॥ द्वितीयः प्रकारः तुत्थके विमलहेममाक्षिके निक्षिपेत्खलु रसेन्द्रमुज्ज्वलम् । मर्दयेद् गृहकुमारिकारसैर्यवदेति खलु नष्टपिष्टताम् ॥७२॥ कारयेच्च तदनन्तरं भिषक् स्थालिकातलगंतं रसेश्वरम् । ऊर्ध्वपातनकयन्त्रपातितमाददीत विमलं रसेश्वरम् ।७३॥ द्वितीयः प्रकारः-तुत्थकेन सह रसेन्द्रं मर्दयित्वाद्विर्बहुशः क्षालयेत् । क्षालनानन्तरं कन्यारसेन मर्दनं कार्यम् । अथवा उपधात्वादि विज्ञानीयोक्तेन प्रथमशोधनप्रकारसमुदितविधिना शोधितेन स्वर्णमाक्षिकेण सह पारदस्य नष्ट- पिष्टत्वमापाद्य कन्यारसेन मर्दनं कार्यम् ॥ ७२-७३ ॥ भा.टी.-तूतिये के साथ साथ पारद को मर्दनकर जल से धोकर साफ कर लें अथवा शुद्ध स्वर्णमाक्षिक चूर्ण के साथ पारद को कुमारीस्वरस से मर्दनकर नष्टपिष्टकर कल्क बना लें । अब इस कल्क को हाँडी में डालकर ऊर्ध्वपातन विधि से ऊपर उड़ा लें ॥ ७२-७३ ॥ वक्तव्य-ऊर्ध्वपातन करने में ऊपर की हाँडी के भीतर पारद चिपका हुआ होता है, उसे किसी कपड़े या बानों के गुच्छे से रगड़कर एकत्र कर लें फिर (चौतह) कपड़े में छान लें ।