रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमस्तरङ्गः ८६ द्वितीयः प्रकारः अथवा काञ्जिकेनैव रसेन्द्रं स्वेदयेद् बुधः । अम्लैः प्रक्षालयेत्सम्यगुत्थितो रसराड् भवेत् ॥ ६६ ॥ तृतीयः प्रकारः रसेन्द्रं काञ्जिकेनेह याममात्रं विमर्दयेत् । सलिलैः क्षालयेत्सम्यगुत्थितो जायते रसः ॥ ६७ ॥ चतुर्थः प्रकारः जम्बीरमातुलुङ्गाद्यैः पेषयेदातपे रसम् । वसनात्सारयेत्सम्यगुत्थितो जायते रसः ॥ ६८ ॥ तत्र प्रथमः प्रकारः—सौभाग्यलवणमधुभिः पारदं पेषयित्वा गोलकं विधाय चतुर्गुणवस्त्रपोट्टल्यां निधाय क्षाराद्यैः सम्यक् त्रिवारं स्वेदयेत् तथा च स्वरूपा- पत्तिर्भवति रसस्य ॥ ६४-६८ ॥ भा.टी.—सुहागा, लवण और मधु के साथ पारद को अच्छी तरह मर्दन कर इसका एक गोला सा बना लें। अब इस गोले को एक पोटली में बाँधकर दोलायन्त्र में क्षार आदि द्रव द्रव्य भरकर स्वेदन करें। इस प्रकार तीन बार स्वेदन करने से पारद उत्थित हो जाता है। अर्थात् इसकी मूर्च्छितावस्था दूर हो जाती है ॥ ६४-६५ ॥ अथवा केवल काञ्जी में दोलायन्त्र द्वारा स्वेदनकर अम्लद्रवों से धो लेने पर पारद उत्थित हो जाता है ॥ ६६ ॥ पारद को केवल अम्ल काञ्जी के साथ तीन पहर तक अच्छी तरह मर्दन कर जल से धो लिया जाय तो वह उत्थित हो जाता है ॥ ६७ ॥ अथवा पारद को जम्भीरी नीबू, विजोरा नीबू आदि अम्लद्रवों के साथ तीन पहर तक धूप में मर्दन करके कपड़े से छान लेने पर भी यह उत्थित हो जाता है ॥ ६८ ॥ पातनत्रितयस्वरूपम् उक्तौषधै रसवरस्य विमर्दितस्य यन्त्राहितस्य यदिहोर्ध्वमधश्च तिर्यक् । निष्कासनं तदिह पातनसंज्ञमुक्तं वङ्गाहिदोषयुगलं शमयत्यनल्पम् ॥६९॥ अथ पातनत्रयस्वरूपम्—अनल्पं समग्रम् ॥ ६९ ॥