रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ | रसतरङ्गिणी
तावत्सुपेषयेद्यावन्नष्टपिष्टत्वमाप्नुयात् । इत्थं सम्मूर्च्छितः सूतो विमुञ्चति मलत्रयम् ॥६२॥ मूर्च्छनस्य प्रथमः प्रकारः—व्याख्यायते । अत्र केचित्—“आरग्वधो हन्ति मलं प्रयत्नात् कुमारिका सप्त हि कञ्चुकांश्च । अंकोलमूलं हि विषं निहन्याद्र- सस्य वह्निः किल पावकञ्च” इत्याहुः । अपरे तु राजवृक्षस्य मूलोत्थचूर्णेन सह कन्यकामलदोषापनुत्त्यर्थम्, चित्रकं वह्निदोषापनुत्यै, त्रिफला वह्निविना- शाय इत्याहुः । प्रक्षेपद्रव्यमानञ्च—“षोडशांशं प्रतिद्रव्यं सूतमानान्नियोजयेत्” इति रसरत्नसमुच्चये । सप्तवाराणि इति मूर्च्छनोत्तरं काञ्जिकेन प्रक्षाल्य पुनः मर्दनं पुनः प्रक्षालनमित्येवं सप्तमूर्च्छनम् ॥ ५६–६२ ॥ भा.टी.—घीकुआर से मलदोष, त्रिफला से अग्निदोष और चित्रकमूल से पारद का विषदोष दूर होता है, अतः इन द्रवों के साथ सात-सात वार पारद को मर्दन कर नष्टपिष्ट करके काञ्जी से धोकर साफ कर लें । इस प्रकार पारद को मूर्च्छित करने से उसके सब दोष नष्ट हो जाते हैं ॥ ५६–६० ॥ खरल में पारा डालकर उसमें जवाखार, सजीखार तथा पाँचों नमक तथा अम्ल द्रव डालकर इतनी दृढ़ता के साथ मर्दन करें जिससे पारद नष्ट- पिष्ट हो जाय । इसके अनन्तर इसे काञ्जी से धोकर साफ कर लें । इस प्रकार मूर्च्छित किया हुआ पारद तीनों दोषों से रहित हो जाता है ॥ ६१–६२ ॥ उत्थापनस्वरूपम् स्वेदाद्यैर्यद्रसेन्द्रस्य मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् । पुनः स्वरूपकरणं तदुत्थापनमीरितम् ॥ ६३ ॥ उत्थापनलक्षणम्-उत्थापनं मूर्च्छाव्यापद्विनाशाय । यदुक्तम्—“स्वेदात- पादियोगेन स्वरूपापादनं हि यत् । तदुत्थापनमित्युक्तं मूर्च्छाव्यापत्तिनाशनम् ॥” इति ॥ ६३ ॥ भा. टी.—उक्त स्वेदन मर्दन तथा मूर्च्छन क्रियाओं से पारद में जो एक प्रकार की मूर्च्छा (असमर्थता) सी आ जाती है उसको दूर कर पुनः अपने स्वरूप को प्राप्त कराना उत्थापन संस्कार कहा जाता है ॥ ६३ ॥ उत्थापनस्य प्रथमः प्रकारः सौभाग्यलवणक्षारैः पारदं पेषयेद् भृशम् । तद् गोलकं विधायथ पोट्टल्यान्तु विनिक्षिपेत् ॥ ६४ ॥ क्षाराम्लैः स्वेदयेत्सम्यक् दोलायन्त्रे भिषग्वरः । एवं वारत्रयं कुर्यादुत्थितो जायते रसः ॥ ६५ ॥