भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

षष्ठस्तरङ्गः ११७ वालुकायन्त्र पकाने पर जब जलीय बाष्प निकल जाय तब कूपी में डाट देना चाहिये, पहिले ही डाट देने से कर्पूर नहीं बनेगा। इस प्रकार से बना हुआ रसकर्पूर रसपुष्प के दाहक तत्त्वों से रहित होता है। अतः इस विधि से बने हुए रसकर्पूर को अन्तःप्रयोग के काम लाना चाहिये। रसकर्पूरस्य गुणाः रसकर्पूरकः ख्यातो बहुभूतविषापहः । त्वग्रक्तदोषशमनो ग्राही रुचिविवर्द्धनः ॥ ७२ ॥ अतीसारप्रशमनो विशेषात्कृमिनाशनः । प्रवाहिकाहरः कामं मात्राधिक्ये विषक्रियः ॥ ७३ ॥ स्फोटं कण्डूमपि च चिरजां मण्डलादींश्च कुष्ठान् । सर्वोत्थं वा सहजमपि वा स्पर्शजं वा फिरङ्गम् । शीघ्रं नानाव्रणगणभवां हन्ति पीडां महोग्राम् कर्पूराख्यो जठरदहनोद्दीपनोऽयं रसेशः ॥ ७४ ॥ शीतले षोडशगुणे सलिले विनिपातितः । सर्वथा द्रवतां याति रसः कर्पूरकाभिधः ॥ ७५ ॥ रसकर्पूरस्य गुणाः—अयं सङ्क्रामकजीवाणुविषनाशनः प्रवाहिकाहर इति कफरक्तमिश्रितां प्रवाहिकां हरति । मात्राधिक्ये विषक्रियः मारक इत्यर्थः । अस्य विशेषगुणाः—सर्वोत्थं सन्निपातिकम्, सहजं जन्मना जातम् । जठरदह- नोद्दीपन इति जाठराग्निप्रदीपनः । स्पष्टमन्यत् ॥ ७२–७४ ॥ अयञ्च स्वापेक्षया षोडशगुणे शीतले जले निपातितः सर्वथा द्रवतां याति । एवञ्च जलपरिमाणं न्यूनान्नूनं ज्ञेयम् , अतोऽपि जलन्यूनतायान्तु न सम्यग् द्रावः स्यादौषधस्येति ॥ ७५ ॥ भा. टी.—उक्त रसकर्पूर अनेक प्रकार के कृमिविष को नष्ट करता है। त्वचा तथा रक्त के दोष को शान्त करता है। शरीर व्रणों में से होनेवाले स्रावों को बन्द करने के कारण यह ग्राही कहलाता है। इसके प्रयोग से अन्न में रुचि होती है। यह अतीसार को शान्त करता है और कृमिनाशक है। कफ-रक्त-मिश्रित प्रवाहिका में हितकर होता है। किन्तु अधिक मात्रा में दिये जाने पर शरीर में पारदविष के लक्षण उत्पन्न कर देता है। इसके अतिरिक्त यह स्फोट (फोड़े), पुरानी खुजली, मण्डल आदि कुष्ठ रोग, सन्निपातिक तथा सहज और स्पर्श-जन्य सभी प्रकार के फिरंग-रोग को नष्ट करता है। अनेक-