रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविध व्रणों में होनेवाली भयंकर पीड़ा को शान्त करता है । और अल्प मात्रा में दिये जाने पर उक्त रोगों को नष्ट करने के साथ-साथ पाचकाग्नि को भी तीव्र कर देता है । यदि इस रसकर्पूर को इससे सोलहगुणा शीतल जल में डाला जाय तो यह उसमें अच्छी तरह घुल जाता है ॥ ७२-७५ ॥ रसकर्पूरस्य मात्रानिरूपणम् आरभ्य रक्तिकायास्तु चतुःषष्ट्यंशतो भिषक् । द्वात्रिंशद्भागपर्यन्तं मात्रामस्य प्रयोजयेत् ॥ ७६ ॥ अथास्य मात्रानिरूपणम्-रक्तिकायाः चतुःषष्ट्यंशत (१/६४) आरभ्य द्वात्रिं- शद्भागपर्यन्तं (१/३२), अस्य मात्रा बलाबलं विज्ञाय दातव्येति ॥ ७६ ॥ भा. टी.—इस रसकर्पूर की मात्रा रत्ती के ६४ चौंसठवें भाग से लेकर बत्तीसवें भाग तक प्रयोग की जाती है ॥ ७६ ॥ रसकर्पूरस्य आभ्यन्तरप्रयोगार्थं मात्रानिर्माणप्रकारः चूल्लिकावणं शुद्धं गुञ्जापञ्चकसंमितम् । समञ्च रसकर्पूरं षष्टितोलकसंमिते ॥ ७७ ॥ जले विनिक्षिपेत्प्राज्ञो मात्रामस्य प्रकल्पयेत् । बिन्दुत्रिंशकतश्चादौ षष्टिबिन्दुमितां पराम् ॥ ७८ ॥ अथास्याभ्यन्तरप्रयोगोपयोगिमात्रानिर्माणप्रकारः—शुद्धं चूल्लिकावणं नवसादरं ५ गुञ्जामितम्, रसकर्पूरञ्च ५ गुञ्जामितम्, षष्टितोलकमिते जले विनिक्षिप्य ३० बिन्दुषतः ६२ बिन्दुपर्यन्तं मात्रां जानीयात् ॥ ७७-७८ ॥ भा.टी.--शुद्ध नौसादर पाँच रत्ती, और रसकर्पूर पाँच रत्ती, इन दोनों को एकत्र पीसकर साठ तोले शीतल जल में घोलकर रख लें । अब इसमें से तीस बूँद से लेकर साठ बूँद तक की मात्रा में प्रयोग करें ॥ ७७-७८ ॥ अस्य आभ्यन्तरप्रयोगार्थं चूर्णरूपेण मात्रानिर्माणप्रकारः श्लक्ष्णं दारुसिताचूर्णं पञ्चमाषकसंमितम् । गुञ्जैकं रसकर्पूरं क्षिपेन्निम्बूव्लमर्दितम् ॥ ७९ ॥ रक्तिकैकमितं चूर्णं मात्रायां विनियोजयेत् । रक्तिकैकमिता पूर्णमात्रास्य परिकीर्तिता ॥ ८० ॥ अथ चूर्णरूपेण मात्रानिर्माणप्रकारः--श्लक्ष्णं मसृणम्, दारुसिता त्वक् ॥ ७६-८० ॥ भा. टी.--पाँच मासे दालचीनीचूर्ण में एक रत्ती रसकपूर (नींबूरस