रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठस्तरङ्गः १११९ में मर्दित ) को अच्छी तरह घोटकर मिला लें । अब इस मिश्रित चूर्ण में से एक एक रत्ती की मात्रा बनाकर प्रयोग करें । इस चूर्ण की पूर्ण मात्रा एक रत्ती समझनी चाहिये ॥ ७६-८० ॥ वक्तव्य—यदि रसकर्पूर में निम्बूकाम्ल (Citric acid) मिला दिया जाय तो यह खराब नहीं होने पाता है और न यह अपनी पूर्वावस्था में ही आता है । क्योंकि रसकर्पूर यदि किसी धातु के पात्र में रखा जाय तो उसमें पारा चिपक जाता है। अतः योगों को बनाने के लिये समझदार वैद्य को चाहिये कि इसे सदा कांच की शीशी या पात्र में रखे । रसकर्पूरस्य आमयिकः प्रयोगः रसः कर्पूरसंज्ञोऽयं मात्रया परिशीलितः । प्राभातिकीं भुक्तमात्रोत्थिताञ्चातिस्रुतिं हरेत् ॥ ८१ ॥ कर्पूराख्यो रसो युक्तः सदाहं चिरकालजम् । द्रवपीतमलोपेतमतीसारं विनाशयेत् ॥ ८२ ॥ शीलितो रसकर्पूरो मात्रया सुचिरोत्थिताम् । सरक्तां सकफाञ्चैव विनिहन्ति प्रवाहिकाम् ॥ ८३ ॥ अथ रसकर्पूरस्य रोगेषु प्रयोगः—प्राभातिकीं प्रातःकाले समुत्पन्नां अति- स्रुतिं अतिसारम् । अपि च मिश्रितकफरक्तामेव प्रवाहिकां हन्ति, नतु विभक्तक- फरक्तामित्यवधेयम् ॥ ८१-८३ ॥ भा.टी. -शुद्धरसकर्पूर को यदि मात्रापूर्वक सेवन किया जाय तो इसमें प्रातःकाल में होनेवाले तथा भोजनोत्तर होनेवाले दस्त बन्द हो जाते हैं । इसको सेवन करने से पुरातन, दाह युक्त तथा पतले पीले दस्तों का अतीसार नष्ट हो जाता है । रसकर्पूर को मात्रापूर्वक सेवन करने से कफ-रक्त मिश्रित मलयुक्त प्रवाहिका शान्त हो जाती है ॥ ८१-८३ ॥ रसकर्पूरगुटिका कुंकुमं मरिचं रक्तचन्दनं च लवङ्गकम् । जातिपत्री पृथक् सर्वं माषकप्रमितं हरेत् ॥ ८४ ॥ विशुद्धं रसकर्पूरं रक्तिकैकमितं क्षिपेत् । संमर्च निम्बुनीरेण कुर्यात् गुञ्जोन्मितां वटीम् ॥ ८५ ॥ रसकर्पूरगुटिका नामतः परिकीर्तिता । शीलिता नवनीतेन फिरङ्गं हन्त्यसंशयम् ॥ ८६ ॥