रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठस्तरङ्गः १२१ रसकपूरत को जल में घोलकर रखा जाय तो वह कुछ दिनों में जल तथा पारद के रूप में पृथक् हो जाता है जिससे उसमें कृमिनाशक शक्ति पूर्णरूप से नहीं रहती है । प्रसङ्गान्निम्बूकाम्लस्य निर्माणप्रकारः निम्बूकलुङ्गकादीनां निर्मलं रसमाहरेत् । काचलिप्ते तु मृत्पात्रे हसन्त्यां क्वाथयेद्भिषक् ॥६०॥ क्वथितञ्च समालोक्य मृत्पात्रमवतारयेत् । कठिनीचूर्णकं दद्यात् यावद्बाष्पोद्गमो भवेत् ॥६१॥ अनन्तरं गन्धकाम्लं क्षिपेत्तावच्छनैः शनैः । चूर्णं कुन्देन्दुसङ्काशं यावद्याति तलस्थताम् ॥६२॥ तलस्थं तं सुविज्ञाय सारयेत्पृथुवाससा । अवशिष्टञ्च वसने पदार्थं सन्त्यजेत् बुधः ॥६३॥ पानीयं सारितं काचपात्रे संस्थाप्य शोषयेत् । जायते शशिसङ्काशं चूर्णं पात्रतलस्थितम् ॥६४॥ अयमेव भिषग्वर्यैर्निम्बूकाम्ल इति स्मृतिः । स्वजातिप्रभवा ह्यस्य गुणाः सर्वे भवन्ति हि ॥६५॥ निम्बूकाम्लनिर्माणे—आदिपदेन तज्जातीनां जम्बीरबीजपूरप्रभृतीनां ग्रहणम् । एषां रसं सारकपत्रगालितम्, काचलिप्तमृत्पात्रग्रहणं रसनैमल्यरक्षार्थम् । हसन्त्यां अङ्गारधानिकायाम् । यत्किञ्चिन्मलापसारणपर्यन्तं क्वाथः तलस्थं सुधा- गन्धकं भवति । उपरिस्थं निर्मलं जलं घनवस्त्रेण सारयेत्, वस्त्रावशिष्टं त्यजेत् पृथक्कुर्यादिति । तच्च सारितं जलं काचपात्रस्थमग्नौ पुनः शोषयेत् । तच्छुष्कं निम्बूकाम्लं भवति, स चायं स्वजातिगुणः निम्बुजम्बीरादिकारणगुण इत्यर्थः ॥ ६०-६५ ॥ भा.टी.—कागजी या बिजौरा नीम्बू का रस निचोड़कर उसे छानकर साफ कर लें। अब इस रस को एक मिट्टी के पात्र में (जिसमें भीतर काँच का मसाला लगाया गया हो) डालकर अँगाठी में रखकर मैल निकालने के लिये पकायें। जब रस साफ हो जाय तो उसे नीचे उतारकर उसमें उसी समय बाष्प निकलने तक थोड़ा-थोड़ा करके खरिया मिट्टी का चूर्ण छोड़ते जायँ। जब बाष्प निकलना बन्द हो जाय तब उसमें थोड़ा-थोड़ा करके गन्धकाम्ल डालें जब तक कि श्वेत वर्ण का चूर्ण तलस्थ न हो जाय। जब तलस्थ होना बंद हो जाय तो इसे एक मोटे कपड़े से छान लें और कपड़े में बचे हुए पदार्थ को फेंक दें। फिर छाने