भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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षष्ठस्तरङ्गः १२३ भा.टी.—रसकर्पूर ३२ बत्तीस तोले को ढाई तोला मद्यसार (अलकोहल) में डालकर घोल लें और इस घोल को जब प्रयोग में लाना हो तब इस घोल में से अष्टमांश घोल लेकर सौ तोले शुद्ध जल में मिला लें और काम में लायें । इस प्रकार से बनाये हुए द्रव में भी रसकर्पूर की अपेक्षा जल दो हजार गुणा अधिक होता है ॥ ९८-१०० ॥ वक्तव्य—उक्तरसकर्पूर द्रव आवश्यकतानुसार अनेक शक्ति के प्रयोग में लाये जाते हैं । अर्थात् कहीं पर एक प्रतिशत और कहीं हजार में एक भाग और कहीं दो हजार में एक और कहीं इससे कम भाग का कर्पूर द्रव बना- कर काम आता है । रसकर्पूरद्रवस्य गुणाः फिरङ्गस्फोटविषहृत् सपूयव्रणशोधनः । हस्तपादस्मरागारगेहादिगतभूतनुत् ॥ १०१ ॥ संक्रामकगदोत्थानभूतघ्नस्तु विशेषतः । रसज्ञैस्तु समाख्यातो रसकर्पूरजो द्रवः ॥ १०२ ॥ अथ रसकर्पूरद्रवस्य गुणाः—अयं प्रक्षालनद्वारा फिरंगस्फोटविषं हरति पूययुक्तान् व्रणान् शोधयति च । तथा हस्तपादयोनिस्थानगृहभित्त्यादिगत- जीवाणुनाशकश्च । विशेषतश्च संक्रामकरोगनिदानजीवाणुहन्ता रसायनज्ञै- रुदाहृतः ॥ १०१-१०२ ॥ भा.टी.—उक्त प्रकार से बनाया हुआ रसकर्पूर द्रव बाह्यप्रयोग में फिरंग व्रण के विष को नष्ट करता है और पूययुक्त व्रणों को शुद्ध करता है अथवा इनको धोने के काम आता है । हाथ, पैर, गुप्तेन्द्रिय, तथा गुदा आदि स्थानों में पाये जानेवाले या संक्रामक विषैले जीवाणुओं को नष्ट करता है। इसी तरह संक्रामक रोगजन्य विष को नष्ट करने में इस द्रव को विशेष रूप से काम में लाया जाता है ॥ १०१-१०२ ॥ वक्तव्य—संक्रामक-रोगपीड़ित रोगी के वस्त्रों को धोने या उसके थूक मूत्र तथा मल के पात्रों को धोने और परिचारक को अपने हाथों को धोने के लिये अथवा नेत्र आदि कोमलांगों के विषव्रणों को धोने के लिये उक्त रसकर्पूर द्रव जल बहुधा काम में आता है । परन्तु आवश्यकतानुसार इसको हलका अथवा तेज शक्ति का बनाया जाता है ।