भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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षष्ठस्तरङ्गः १३३ अर्शोग में रसपर्पटी को एक मास तक गोमूत्र के साथ सेवन कराने से अर्श- रोग नष्ट हो जाता है। निम्ब पञ्चांग, शुद्ध भिलावा, बाकुची तथा भांगराचूर्ण के साथ पर्पटी-सेवन से सब कुष्ठ रोग नष्ट हो जाते हैं। दशमूलकषाय के साथ पर्पटी सेवन करने से भयंकर वातज्वर शान्त हो जाता है। त्रिकटुचूर्ण मिलाकर रसपर्पटी का सेवन कराने से कफजन्य कास शीघ्र ही शान्त हो जाता है। वक्तव्य—संग्रहणी, पुरातन अतीसार में पर्पटी का सेवन कराने पर दूध, मठा, अथवा फलों का ही सेवन कराने से शीघ्र और स्थायी लाभ होता है। अतः भयानक अवस्थावाले उक्त रोगी को पर्पटी सेवन के साथ अन्न तथा गुरु पदार्थ भोजन के लिये नहीं देने चाहिये ॥ १४४-१५३ ॥ पर्पटिकाभक्षणसमनन्तरं जलपाननिषेधः रसबलिपर्पटिकाया भक्षणसमकालमेव दोषज्ञैः । नादेयं वा कौपं पानीयं नैव पानीयम् ॥१५४॥ पर्पटिकायाः पथ्यानि काकाह्वा च पटोलकं सुविशदं पूगीफलञ्चार्द्रकं वास्तूकं कदलीप्रसूनममलं कृष्णाञ्च वार्तिङ्गनम् ! सूक्ष्माश्चाथ पुरातनाः कृमिगणैर्हीनास्तथा शालयः पानं गोपयसः सशर्करमलं पथ्यं बुधैः कीर्तितम् ॥१५५॥ जलपाननिषेधो विकारहेतुत्वात् । कौपं कूपभवम्, नादेयं नदीजातम् । काकाह्वा काकमाची, वार्तिङ्गनं वृन्ताकम् ॥ १५४-१५५ ॥ भा.टी.—पारद गन्धक की पर्पटी सेवन करने के तत्काल बाद तृषा लगने पर भी कुआँ अथवा नदी का जल नहीं पीना चाहिये। इससे रोगोत्पत्ति अथवा रोगवृद्धि का डर रहता है ॥ १५४ ॥ पर्पटी सेवन काल में मकोय, परवल, सुपारी, अदरख, बथुआ, केले के फूल, काला और कोमल बीज रहित बैगन, बिना घुन लगे बारीक पुराने बासमती आदि चावल, खांड या मिश्री युक्त गो दूध; ये वस्तुयें पथ्य मानी जाती हैं॥१५५॥ प्रकारान्तरेण पथ्यानि पुराणाः शालयः शाके वृन्ताकं वा पटोलकम् । गवां दुग्धन्तु सततं पथ्यमेतच्चतुष्टयम् ॥१५६॥ प्रथमायामवस्थायां दुग्धं सात्म्यं न चेद्भवेत् । अतीसारप्रवृत्तिः स्यात्तदा तन्नैव योजयेत् ॥१५७॥