रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ रसतरङ्गिणी रसपर्पटिका साज्यमुन्मादमिह नाशयेत् ॥१४४॥ ब्राह्मीरससमायुक्ता गुञ्जाष्टकमिताशिता । रसपर्पटिका काममपस्मारं निवारयेत् ॥१४५॥ रामठेनार्धगुञ्जेन सगुञ्जाष्टकजीरका । रसपर्पटिका भुक्ता ग्रहणीं हन्ति दारुणाम् ॥१४६॥ व्योषनिम्बुदलोपेता भक्षिता रसपर्पटी । सप्ताहद्वितयेनैव त्वपस्मारं विनाशयेत् ॥ १४७ ॥ वर्धमानकबीजोत्थतैलेन परिशीलिता । शूलं गुग्गुलुना पाण्डुशोफं हन्यात्तु पर्पटी ॥१४८। धूर्त्तबीजसमायुक्ता रसपर्पटिकाशिता । गुञ्जापञ्चकमात्रन्तु हन्त्युन्मादं विशेषतः ॥१४६॥ गोमूत्रेण समायुक्ता रसपर्पटिकाशिता । मासमात्रप्रयोगेण नाशयेद् गुदजामयम् ॥ १५० ॥ निम्बपञ्चकभल्लातवाकुचीभृङ्गसंयुता । निहन्ति सर्वकुष्ठानि रसपर्पटिकाशिता ॥१५१॥ दशमूलकषायेण शीलिता रसपर्पटी । विनाशयेद्विशेषेण दारुणं वातिकं ज्वरम् ॥ १५२ ॥ त्र्यूषणक्षोदसंयुक्ता रसपर्पटिकाशिता । विनिहन्त्यचिरादेव कासं खलु कफोत्थितम् ॥१५३॥ नाकुली रास्ना, रामठं हिङ्गु,वर्धमानक एरन्डः, निम्बपञ्चकं निम्बपञ्चाङ्गम॥ भा.टी.-पर्पटी को उन्माद रोग के लिये आठ रत्ती मात्रा तक लेकर रास्ना- मूलचूर्ण के साथ गोघृत में मिलाकर सेवन करना चाहिये । दो से आठ रत्ती मात्रा तक ब्राह्मीरस के साथ सेवन कराने से अपस्मार रोग को नष्ट करती है । आधी रत्ती हींग, आठ रत्ती रसपर्पटी, आठ रत्ती श्वेतजीरकचूर्ण मिलाकर कुछ दिन सेवन करने से दुःसाध्य संग्रहणी रोग नष्ट हो जाता है । त्रिकटु- चूर्ण और पर्पटी को मिला नींबू के पत्रकल्क के साथ सेवन करने से दो सप्ताह में अपस्मार ( मृगी ) रोग नष्ट हो जाता है । उदरशूल में इसको एरन्डबीज- तैल के साथ सेवन कराना चाहिये और शोथ युक्त पाण्डु रोग में इसको गुग्गु- लुचूर्ण में मिलाकर सेवन कराना चाहिये । पाँच रत्ती मात्रा तक पर्पटी को लेकर धत्तूरबीजचूर्ण के साथ सेवन कराने से उन्माद रोग को नष्ट करती है।