रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठस्तरङ्गः १३१ मृदुपाक युक्त पर्पटी तोड़ने पर कुछ मुड़कर टूट जाती है, मध्यपाक में वह बड़ी आसानी से टूटनेवाली हो जाती है, किन्तु खरपाक में पपड़ी न बन- कर वह कुछ लाल वर्ण का सा चूर्ण हो जाता है ॥ १३६ ॥ पर्पटिकाया गुणाः ग्रहणीगजमर्दनदक्षतरा क्षयकासजलोदरगुल्महरा । अतिसारमतिभ्रमदाहहरा ज्वरशोथहरा रसपर्पटिका ॥१४०॥ अर्शोंरोगं हरति सुतरां कामलां शूलकोपं । पाण्डुव्याधिं श्वयथुसहितं भस्मकञ्चातिभीष्मम् । कुष्ठान्यष्टादश श्वयथुमथोत्सेधकं सर्वरूपं प्लीहानञ्च प्रविततरुजं त्वामवातानशेषान् ॥ १४१ ॥ अम्लपित्तशमनी हरणीया वृद्धदोषदमनी रमणीया । कामशुक्रजननी मदनीया पर्पटी क्व न भवेत्कमनीया ॥१४२॥ उत्सेधकं शोथम् । मदनीया हर्षकरी ॥ १४०-१४२ ॥ भा.टी.—पर्पटी, ग्रहणी रोगरूपी हाथी के मर्दन में अत्यन्त उपयोगी होती है । इसके अतिरिक्त क्षय, कास, जलोदर, गुल्म, पुरातन अतीसार, बुद्धिभ्रम, दाह, ज्वर तथा शोथ को नष्ट करती है। इसके प्रयोग से अर्शरोग, कामला, शूल ( उदर-रोग ), पाण्डुरोग ( शोथ युक्त ), अतिभीषण भस्मक रोग आदि नष्ट हो जाते हैं । यह अठारह प्रकार के कुष्ठ तथा त्वक् रोगों और अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा तथा सब प्रकार के आमवात को भी नष्ट करती है। यह पर्पटी अम्लपित्त को शमन करती है । वृद्धावस्थाजन्य दौर्बल्य को दूर करती है, कामशक्ति को बढ़ाती तथा शुक्र की उत्पत्ति आदि कार्य करने से हर प्रकार से उत्तम औषधि है ॥ १४०-१४२ ॥ पर्पटीमात्रा गुञ्जाद्वितयमेवादौ मात्रामस्य प्रकल्पयेत् । क्रमवृद्धया च वितरेद् गुञ्जादशकमन्ततः ॥ १४३ ॥ पर्पटी कल्प या सेवन कराने से प्रारम्भ में दो रत्ती की मात्रा ही देनी चाहिये । फिर क्रमशः बढ़ाते हुए दस रत्ती तक इसकी मात्रा कर देनी चाहिये ॥ १४३ ॥ रसपर्पटिकाया आमयिकः प्रयोगः नाकुलीमूलरजसा गुञ्जाष्टकमिता सिता ।