रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० रसतरङ्गिणी शीघ्रं गोमयसंस्थिते तु कदलीपत्रे ततो निक्षिपेत् ॥१३६॥ निक्षिप्तमात्रं कदलीपलाशैराच्छादयेद्वै सुचिरं रसज्ञः । यस्मादियं पर्पटकतुल्यरूपा तस्मान्मता पर्पटिकाभिधेया ॥१३७॥ अथ रसपर्पटिका—मोटा जयन्ती, उरुबूक एरण्डः, दैत्येन्द्रो गन्धकः, कच- रञ्जनं भृङ्गराजः । कोलककोकिलाः बदराङ्गाराः ॥ १३५-१३७ ॥ भा.टी.—पहिले हिंगुलोत्थपारद को अरणी, एरण्डमूल तथा अदरखरस के साथ तीन दिन मर्दन करके धोकर साफ कर लें । फिर शुद्ध गन्धक को भांगरे के रस की सात भावना देकर सुखा लें, फिर इसे एक लोहपात्र या करछी में रखकर बेर के कोयले की अग्नि में पिघलाकर भांगरे के स्वरस में बुझा लें । इस प्रकार शुद्ध गन्धक, और पूर्वोक्त प्रकार से शुद्ध पारद दोनों को समभाग लेकर दोनों की अच्छी तरह कज्जली बना लें । अब इस कज्जली को एक लोहे की चम्मच में डाल कर इसे ( चम्मच ) कोयलों की अग्नि पर रखकर पिघलायें । जब यह कज्जली पिघलकर कीचड़ की भाँति गीली हो जाय तब इसे गोबर के ऊपर बिछे हुए केले के पत्ते पर डाल दें और डालते ही एक दूसरे कदलीपत्र से इसे दबाते हुए ढँक दें और अच्छी तरह शीतल होने तक इसी तरह रहने दें । इस प्रकार कदलीपत्र से दबाने पर यह पपड़ी सी बन जाती है । अतः इसे पर्पटी नाम से कहा जाता है ॥ १३५-१३७ ॥ वक्तव्य—कज्जली को लोहे की चम्मच में डालने से पूर्व चम्मच में थोड़ा सा घी लगा लेना चाहिये जिससे द्रव्य उसमें चिपका न रह जाय और अग्नि से गन्धक जल न जाय । पर्पटिकापाकस्य त्रैविध्यम् मृदुर्मध्यः खरश्चेति पाकोऽत्र त्रिविधः स्मृतः । आद्यौ प्रयोजयेद्वैद्यः खरन्तु विषवत्त्यजेत् ॥१३८॥ त्रिविधपाकानां स्वरूपाणि मृदुपाके न भंगः स्यात्तत्सारल्यञ्च मध्यमे । द्वयोः सचन्द्रिकं काष्ण्यं खरे चूर्णञ्च लोहितम् ॥१३६॥ खरपाकस्य त्यागो गन्धकदाहात् ॥ १३८-१३६ ॥ भा.टी.—मृदु, मध्य तथा खर भेद से पर्पटी का त्रिविध पाक होता है । इनमें से मृदु तथा मध्य पाक युक्त पर्पटी का औषधि रूप में प्रयोग करना चाहिये, किन्तु खरपाक युक्त पर्पटी को विष के समान त्याग देना चाहिये ॥१३८॥