भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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पृष्ठ 179

षष्ठस्तरङ्गः १३७ प्रकारान्तरेण रससिन्दूरनिर्माणं शिष्यमतिवैशद्यार्थम् । मलिनामिति कृष्णां नतु मलयुताम् । विधानविज्ञः पीतधूमाद्यालोकननिपुण इत्यर्थः ॥१६८–१७६॥ भा.टी.—खरल में आठ तोले शुद्ध पारद तथा आठ तोले शुद्ध गन्धक डालकर इन दोनों को एकत्र दो दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके कज्जली बना लें । अब इस कज्जली को बड़ के अंकुरस्वरस से अथवा कोमल छोटी- छोटी सेमल की मूसलियों के स्वरस से तीन भावना देकर सुखा लें । अब एक दवात के सदृश आकार की शीशी लेकर उसको रुई और मिट्टी के गारे से सात कपड़मिट्टी पृथक् करके सुखा लें । इस शीशी में उक्त कज्जली को भर कर बालुकायन्त्र में रखकर इसके नीचे मन्द, मध्य और तीव्र क्रम से अग्नि जलावें परन्तु पहिले पहल ३ घंटे तक मन्द-मन्द अग्नि देकर फिर मध्यम अग्नि देवें । जब ६ घंटे में गन्धक जीर्ण हो जाय तो काचकूपी के मुख के ऊपर डाट लगाकर उसको गुड़ और चूने के कल्क से अच्छी तरह बन्द कर दें । और फिर ६ घंटे तक उसको तीव्र अग्नि देकर रससिन्दूर का पाक करें । बालुकायन्त्र के स्वतःशीत हो जाने पर शीशी को निकाल उसमें से लाल कमल सदृश वर्ण का शीशी के गले में लगा हुआ रससिन्दूर निकालें ॥ १६८–१७६ ॥ तलस्थरससिन्दूरस्य निर्माणप्रकारः रसगन्धौ समौ कृत्वा तयोः कुर्याच्च कजलीम् । तां क्षिपेत्काचकूप्यन्तर्मुखे मुद्रां च दापयेत् ॥१७७॥ विस्तारे च तथायामे निम्नतायां भिषग्वरः । हस्तैकप्रमितं गतं कृत्वा कूपीं तु विन्यसेत् ॥१७८॥ चतुरङ्गुलमुत्सेधे वालुकाभिः प्रपूरयेत् । स्याच्च शिष्टः कूपिकायाः कायस्तद्वदनावृतः ॥१७९॥ वन्योपलैस्तु तद्गर्तं पूरयित्वा पुटेत्खलु । स्वांगशीतां कूपिकाञ्च तस्मादपहरेद् भिषक् ॥१८०॥ तलस्थं रससिन्दूरं शोणवर्णं प्रजायते । नाम्नाधःसैकतं यन्त्रं खल्वेतत्परिकीर्तितम् ॥१८१॥ नरेन्द्रनाथमित्राख्यैरयं पन्था निदर्शितः । अनुभूतश्च सुगमः प्रकारः सम्प्रकीर्तितः ॥१८२॥ अनावृत इति वालुकाभिः । दृष्टकर्मणा वैद्येनायं विधिः सम्पाद्यः । चतुरङ्गुल- मित्युपलक्षणम्, तेन कज्जलीपूर्णभागं यावद्वालुका देया। स्पष्टमन्यत् १७७–१८२