रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० रसतरङ्गिणी रससिन्दूर बनाना हो उसे गन्धक जीर्ण होने पर डाट लगाकर बन्द करने के बाद छः घंटे की तीव्र अग्नि अवश्य देनी चाहिये ॥ १८७-१८८ ॥ अथ षड्गुणगन्धकजीर्णरससिन्दूरम् पामारिविमलोऽङ्गसङ्ख्यकपलः सूतस्य चैकं पलं सम्पेष्याथ विभावयेद् बुधवरो यामं कुमारीरसैः । कूपीमध्यगतं विधाय सिकतायन्त्रे ततः सम्पचेत् गाढं वासरसप्तकञ्च विधिना सिन्दूरकं चाहरेत् ॥१८६॥ अङ्गसंख्यकपलं इति गन्धस्य षट्पलानि। षड्गुणगन्धस्य सप्तभिर्दिनैः पाकः ॥ १८६ ॥ भा.टो.—शुद्ध गन्धक छः पल ( ४८ तोला ) और शुद्ध पारद एक पल ( आठ तोला ) लेकर इसकी कज्जली करके इसको कुमारीस्वरस से तीन घंटे तक अच्छी तरह मर्दन कर सुखा लें और कपड़मिट्टी की हुई काँच की दृढ़ बोतल में भरकर इसे वालुकायन्त्र में रखकर क्रमवृद्धि रूप से सात दिन अग्नि देते हुए पाक कर लें । अर्थात् गन्धक जीर्ण होने पर डाट देकर फिर उसे दो पहर की अग्नि देकर सांगशीतल करके शीशी में से सुन्दर रससिन्दूर को निकालकर रख लें ॥ १८६ ॥ अथ रससिन्दूरस्य गुणाः प्रमेहकरिकेशरी प्रबलशूलकालानलो भगन्दरहरः परं खलु महाज्वरेभांकुशः । समस्तगदतस्करः सकलशोषसंशोषको रसोऽतुलविलासदो विजयते हि सिन्दूरकः ॥ १६० ॥ अलं मलयजानिलैः किमिह भेषजानां कुलैः वृथैव घनशीतलैः सरसचन्दनालेपनैः । सखे मदनजीवनं रतिविलासलीलागृहं प्रकामबलकान्तिदं भज रसं ससिन्दूरकम् ॥ १६१ ॥ गुल्मप्लीहहरा रतिप्रियकरो यक्ष्मद्वेभपंचाननः पाण्डुस्थौल्यविधूननो व्रणहरो रौक्ष्याग्निमान्द्यापहः । कुष्ठव्याधिनिषूदनो रतिकलाप्रौढांगनारञ्जनः कान्तामस्तकभूषणो रसपतिर्भूयात्सदा श्रेयसे ॥१६२॥