भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 188, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 188

१४८ रस्तरङ्गिणी मिर्च, पीपल ), छोटी कटैली, हरड़ और धनिया इसके समभाग चूर्ण के साथ रससिन्दूर का प्रयोग करना चाहिये । मदात्यय रोग में हींग, अजवाइन, सौंठ, चव्य, धनिया और सौंचलनमक चूर्ण के साथ रससिन्दूर का सेवन करना चाहिये । परिणाम शूल रोग में रससिन्दूर को जवाखार और सुहागा मिलाकर प्रयोग करना चाहिये । रक्तप्रदर में इसको प्रतिदिन दो बार वासाक्वाथ अथवा लोध्रकषाय के साथ प्रयोग करने से आराम आता है । मूत्राशय के बस्ति-कुण्डल रोग में रससिन्दूर को त्रिफलाक्वाथ अथवा काञ्जी के साथ सेवन कराना चाहिये और क्वाथ और काञ्जी में सैन्धानमक मिलाकर पिलाना चाहिये । बालकों के नव ज्वर और प्रतिश्याय ( जुकाम ) में इसको तुलसीपत्र स्वरस के साथ प्रयोग करना चाहिये । बच्चों के श्वास-कास में इसे छोटी कटैली के स्वरस के साथ देना चाहिये । यहाँ पर भिन्न रोगों पर रससिन्दूर का प्रयोग करने के लिए यद्यपि अनेक प्रकार के अनुपान तथा सहपानों का उल्लेख किया गया है । किन्तु सहपान तथा अनुपान का कोई नियम न होने से उसी सह- पान अनुपान को देश काल की अवस्थानुसार दूसरे रोग में दे सकते हैं । यह सहपान तथा अनुपान की कल्पना चिकित्साकुशल वैद्य के ऊपर निर्भर होती है अर्थात् वैद्य अपनी बुद्धि से इनके स्थान पर दूसरे सहपान-अनुपान कल्पित कर सकता है अथवा इन्हींको उल्लिखित रोगों में प्रयोग कर सकता है॥२०३-२३४॥ अथ रससिन्दूरस्य मात्रा एकहायनदेशीयं बालकं वीक्ष्य रोगिणम् । गुञ्जायाः षोडशो भागस्तत्र मात्रा प्रकल्प्यते ॥२३५॥ तथा द्विवर्षदेशीये सप्तमो भाग इष्यते । रसहायनदेशीये तृतीयं भागमाहरेत् ॥२३६॥ द्वादशाब्दजदेशीये गुञ्जार्द्धं परिकल्पयेत् । गुञ्जामात्रािमता चास्य पूर्णमात्रा प्रशस्यते ॥२३७॥ अथास्य मात्रानिरूपणम्—एकहायनदेशीयमिति प्रकारे देशीयर् प्रत्ययः । एकवर्षकल्पमित्यर्थः । रसहायनदेशीये षड्वर्षवयस्के, अस्य च तरुणपुरुषयोग्या पूर्णमात्रा गुंजैकमिति ॥ २३५-२३७ ॥ भा.टी.—एक वर्ष की आयुवाले रोगी बालक के लिए रससिन्दूर की मात्रा रत्ती का सोलहवाँ भाग निश्चित करना चाहिये । दो वर्ष के बालक के लिए रत्ती का सातवाँ भाग समझना चाहिये । ६ वर्ष की आयुवाले बालक की रससिन्दूर मात्रा रत्ती का तीसरा भाग समझना चाहिये । बारह वर्ष

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक) · पृष्ठ 188, कुल 799 में से · BharatKosha