रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९२ रसतरङ्गिणी सर्वप्रथम शूलपाणि ( शिव ) ने इस रस को बनाकर सिद्धों को सेवन कराया था, अतः इसे सिद्धमकरध्वज संज्ञा दी गयी है ॥ २४५-२४७ ॥ अथास्य गुणाः क्षयक्षयकरः परं प्रबलकासकालानलः प्रमेहकुलमण्डनः प्रविततान्त्रशोषान्तकः समस्तगदभञ्जनः प्रमदकामिनीरञ्जनः सदैव मकरध्वजो विजयते रसाधीश्वरः ॥ २४८ ॥ भा.टी.-यह सिद्धमकरध्वजरस क्षयरोग को नष्ट करता है । भयंकर दुःखदायी कास को मिटाता है-। सम्पूर्ण प्रमेह रोगों को दूर करता है । आँतों में होनेवाले शोष ( क्षय ) रोग को मिटा देता है । साधारणतः यह सभी रोगों को नष्ट करनेवाला और यौवनमस्त स्त्री को रमण क्रिया से प्रसन्न करनेवाला गुण रखता है ॥ २४८ ॥ अथ सर्वाङ्गसुन्दरो रसः रसेश्वरः पलमितो गन्धकश्चापि तन्मितः । भूधात्रिकाहस्तिशुण्डीद्रवेणाथ निरन्तरम् ॥२४९॥ रसतन्त्रविशेषज्ञः पेषयेद्दिनसप्तकम् । संस्थाप्य संपुटे सूतं वालुकायन्त्रगं भृशम् ॥२५०॥ मन्दानलेन सुपचेदहोरात्रं भिषग्वरः । जाते पाके स्वाङ्गशीतं सम्पुटं त्ववतारयेत् ॥२५१॥ सम्पुटान्तश्च संलग्नं पीतं भस्म समुद्धरेत् । पूर्वाचार्यैः कीर्तितोऽयं नाम्ना सर्वाङ्गसुन्दरः ॥२५२॥ अथ सर्वाङ्गसुन्दरः (पीतभस्माख्यः)—भूधात्रिका तामलकी । स्पष्टमन्यत् । मात्रादिकं रससिन्दूरवत् ॥ २४९–२५२ ॥ भा.टी.-शुद्ध पारद एक पल ( आठ तोला ), शुद्ध गन्धक एक पल ( आठ तोला ) इन दोनों की कज्जली बनाकर इसको सात दिन तक भुई, आँवला और हस्तिशुण्डी के स्वरस से निरन्तर मर्दन करके सुखा लें और एक दृढ़ संपुट में बन्द करके अच्छी तरह सन्धिलेपकर सुखा लें । अब इस सम्पुट को वालुकायन्त्र में रखकर चौबीस घण्टे तक मन्द-मन्द अग्नि से पकावें।