रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजब पाक हो जाय तब स्वतः शीत सम्पुट के भीतर लगी हुई पीत वर्ण भस्म को निकालकर रख लें । इसको पूर्वाचार्य लोग सर्वांगसुन्दर रस या पीतभस्म कहते हैं ॥ २४६-२५२ ॥ अथास्य गुणाः हृदयप्रीतिजननो जठरामयनाशनः । बलवर्णप्रदाता च ज्वरद्विरदकेशरी ॥२५३॥ वातव्याधिहरश्चैष जाठराग्निप्रदीपनः । शूलद्विपाङ्कुशः शीघ्र प्रकामं कामवर्द्धनः ॥२५४॥ सहपानादिकञ्चास्य यथारोगं भिषग्वरः । रससिन्दूरवन्नित्यं वीक्ष्य दोषं प्रकल्पयेत् ॥२५५॥ इति मूर्च्छनाविज्ञानीयो नाम षष्ठस्तरङ्गः भा.टी.—यह सर्वाङ्गसुन्दर रस सेवन करने पर हृदय में अत्यन्त प्रसन्नता उत्पन्न करता है । उदय रोग अथवा अतीसार को नष्ट करता है । शरीर में बल तथा वर्ण को बढ़ाता है । ज्वर रूपी हाथी के लिए सिंह समान घातक है। सब प्रकार की वात व्याधियों को मिटाता है और पाचनशक्ति को प्रबल करता है । शूल रूपी हाथी के लिए अंकुश के समान नियामक है । कुछ काल तक नियमपूर्वक सेवन करने से शरीर में कामशक्ति को बढ़ाता है । इस रस के प्रयोग में शारीरिक दोषों का अच्छी तरह निर्णय करके रोगानुसार रससिन्दूर की भाँति सहपान तथा अनुपान की कल्पना करनी चाहिये ॥ २५३-२५५ ॥ इति मूर्च्छनाविज्ञानीय नाम षष्ठतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ पारदमारणविज्ञानीयः सप्तमस्तरङ्गः सामान्येन मारणस्य लक्षणम् विविधक्रमयोगेन गन्धकाद्यौषधैः सह । रसादीनाञ्च धातूनां रोगापनयनक्षमम् ॥१॥ गन्धकादियुतं वापि यदम्बरसुधान्वितम् । भस्मतापादनं यत्त मारणं तदिहोच्यते ॥ २ ॥ तत्रादौ मारणलक्षणं पूर्वाचार्य्यैरनिर्दिष्टप्रायं नव्यपरिभाषामम्मतमाह । विवि- धेति—विविधक्रमाः प्रकारभेदेन तत्र तत्रोक्ताः, रोगापनयनक्षमं सूक्ष्मतापत्त्या शरीरावयवव्याप्तिद्वारा तत्तद्व्याधिघातसमर्थम् । गन्धकाद्यौषधैरित्यादिना रसभ-