रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 201, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें११ सप्तमस्तरङ्गः १६१ शरीर को क्षीण करनेवाले क्षय रोग को नष्ट करके उसमें क्रान्ति उत्पन्न करता है । स्मरणशक्ति को बढ़ाता हुआ शरीर को अत्यन्त मजबूत कर देता है । एक वर्ष तक इसका सेवन किया जाय तो शरीर का बुढ़ापा रोग नष्ट हो जाता है । इस रसभस्म के गुणों का वर्णन करना कठिन है । पारदभस्म सेवन पर स्त्री-रमण और बिहार की शक्ति बहुत बढ़ जाती है जिससे अनेक युवती स्त्रियों को पुरुष तृप्त कर सकता है। पारदभस्म मनुष्य के हृदय में विषयेच्छा रूपी कली को खिला देती है । अतः विषय से अधिक प्रेम करनेवाले मनुष्यों का मृतपारद ही एक मात्र औषधि है । मृतपारद शृङ्गार रस का सर्वस्व तथा सुरत (भोग) का अधिदेवता तथा स्त्रियों को वश में करने के लिये एक मंत्र है ॥३६-४०॥ अथ मृतसूतस्य आमयिकः प्रयोगः पांशुमुस्तकषायेण सुरसाकथितेन वा । कणाक्वाथेन वा युक्तो मृतः सूतो हरेज्ज्वरम् ॥ ४१ ॥ लाक्षया वा हरीतक्या तथा सिंहिकयान्वितः । माक्षिकेणापि वा युक्तो रक्तपित्तं व्यपोहति ॥ ४२ ॥ व्याघ्रीक्वाथेन कणया चापि कासकुलान्तकः । वरानिशाकषायेण पाण्डुरोगं विनाशयेत् ॥ ४३ ॥ क्षीरिबृक्षकषायेण पल्लवाङ्गजलेन वा। क्वाथेन शृतशीतेन हन्त्यतीसारमुद्धतम् ॥ ४४ ॥ रसालजम्बूदलजद्रवेण गुडान्वितेनाथ सुपाचितेन । बालेन बिल्वेन सनागरेण प्रवाहिकां हन्ति मृतो रसेशः ॥४५॥ हिङ्गुना सकणेनेह विषूचीं हन्ति दारुणाम् । पथ्यया काञ्जिकेनापि त्वजीर्णं हरति क्षणात् ॥ ४६ ॥ तैलसैन्धवसंयुक्तपुटपाचितसूरणैः । अर्शांसि नाशयत्याशु दीर्घकालोद्भवान्यपि ॥ ४७ ॥ बीजपूराम्भरुचकैः हिक्कापञ्चकनाशनः । सितालाजजलक्षौद्रैश्छर्दि दाहञ्च नाशयेत् ॥ ४८ ॥ अजादुग्धविपक्केन वैदेहीपाचितेन च । घृतेन गन्धकेनापि सक्षतं क्षपयेत् क्षयम् ॥ ४९ ॥ गोक्षुरादिकषायेण मसूरक्वथितेन वा । क्षौद्रेणापि युतः सूतो मूत्रकृच्छ्रं व्यपोहति ॥ ५० ॥