भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 210

स्नान करना, शरीर में उबटन करना, स्त्रियों के साथ सदा उठना-बैठना, सदा चिन्तित रहना या किसी से मन में कुढ़ते रहना, जल न पीकर प्यासा रहना, भूख को रोकना, मद्यपान करना त्याग देना चाहिये ॥ ८६ ॥ वक्तव्य—पूर्वोक्त अपथ्य के अतिरिक्त अधिक जागरण, अधिक भाषण, अत्यधिक भोजन, भोजन के ऊपर और भोजन करना आदि भी अपथ्य सम- झना चाहिये। रससेवने पथ्यम् शृङ्गवेराज्यधानेयजीरकैः परिसंस्कृतम् । वातिङ्गनं पटोलञ्च तण्डुलीयं च वास्तुकम् ॥६०॥ शाकं पौनर्नवञ्चापि पद्ममूलादिकन्तथा । पुराणाः शालयो गव्यं दुग्धं दधि घृतन्तथा ॥६१॥ गोधूमो मुद्गसूपञ्च तथा हंसोदकं हिमम् । रसेन्द्रस्य बुधैः प्रोक्तं पथ्यमेतत्समासतः ॥६२॥ रससेवने च पथ्यं शृङ्गवेरेति—तथा च रसार्णवे “दिवारात्रं जपेन्मन्त्रं नास- त्यवचनं वदेत् । हितं दुग्धान्नमुद्गाज्यशाल्यन्नानि सदा मतम् ॥ शाकं पौनर्नवं देवि ! मेघनादं सवास्तुकम् । सैन्धवं नागरं मुस्तां पद्ममूलानि भक्षयेत् ॥ आत्मज्ञानं कथा पूजा शिवस्य च विशेषतः ॥” इत्यादि ॥ ६०–६२ ॥ भा.टी.—साधारणतः पारदभस्म या इनके योगों के सेवनकाल में बैगन, परवल, चौलाई, बथुआ, पुनर्नवापत्र, भसींड़ की सब्जी या शाकों में अदरक, धनिया तथा जीरा मसाला डालकर घी से छौंककर सेवन करना चाहिये । अन्नों में पुराने बासमती साठी आदि चावल, गेहूँ, मूंग की दाल लेनी चाहिये । स्निग्ध पदार्थों में गोदुग्ध, दही और घी का सेवन करना चाहिये । पीने के लिये जल के स्थान में हंसोदक (चन्द्रमा और सूर्यकिरणों से शुद्ध और संस्कृत भौमजल) लेना चाहिये । पारद-सेवनकाल में संक्षेप से यह पथ्यविधान बताया गया है ॥ ६०–६२ ॥ कूष्माण्डं कमठः कलिङ्गकफलं कोलं कुलत्थास्तथा कर्कोटी कतकं कपित्थकफलं वै काञ्चनीयं सुमम् । कङ्गुः काञ्जिककारवेल्लकफलं कर्कोटकः कर्कटी कौसुम्भञ्च कपोतकः खलु गणः प्रोक्तः कफारादिकः॥६३॥