रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमस्तरङ्गः १६६ रसभक्षणकालः प्रत्यूषे भक्षयेत्सूतं पथ्यं यामे तदादिमे । द्वितीययामे मतिमानश्नीयाद् भोजनं हितम् ॥८६॥ रससेवनकालक्रमः प्रत्यूष इति—हितमिति वक्ष्यमाणपथ्यानुसारि ॥ ८६ ॥ भा. टी.—पारदभस्म या पारद के योगों को प्रातःकाल से लेकर तीन घंटे के अन्दर पथ्य सेवन करें, दूसरे पहर में क्षुधा लगने पर आगे लिखे अनुसार अनुकूल भोजन खिलाना चाहिये ॥ ८६ ॥ अथ मात्राभेदः हिरण्यजीर्णसूतस्य गुञ्जार्द्धं वितरेद्भिषक् । जीर्णवैक्रान्तकस्यापि तथा मात्रां प्रकल्पयेत् ॥८७॥ जीर्णवज्ररसेशस्य गुञ्जापादः प्रशस्यते । गुञ्जेकां तु तदन्येषां मात्रां प्राज्ञः प्रकल्पयेत् ॥८८॥ तथा इति गुञ्जार्द्धकमेव ॥ ८७-८८ ॥ भा.टी.—यदि रसायन कार्य के लिये स्वर्णजारित पारद का प्रयोग करना हो तो इसकी आधी रत्ती मात्रा देनी चाहिये । इसी तरह वैक्रान्तजीर्ण पारद की भी आधी रत्ती मात्रा देनी चाहिये । यदि वज्र (हीरा ) जीर्ण पारद का प्रयोग कराना हो तो इसकी चौथाई रत्ती देनी चाहिये । इसके अतिरिक्त अन्य पारद योगों की मात्रा एक रत्ती तक समझनी चाहिये ॥ ८७-८८ ॥ अथ रसायनसेवनेऽपथ्यानि मिथ्याहारविहारपानसलिलक्रीडातिनिद्रादिकं कोपं दुःखमतिस्पृहामतिमुदं स्नानं तथोद्वर्तनम् । स्त्रीणां नित्यमतिप्रसंगमनिशं चिन्तामसूयां तृषां क्षुद्रोधञ्च मदं रसायनसुधासेवी सदा वर्जयेत् ॥८९॥ अतिस्पृहां अतिकामनाम् । तथा चाहुः प्राज्ञाः-‘‘अतिमानं चात्यशनमति- निद्रातिजागरम् । स्त्रीणामतिप्रसङ्गञ्च आध्मानञ्च विवर्जयेत् ॥ अतिकोपञ्चातिहर्षम- तिदुःखमतिस्पृहाम् । शुष्कवादं जलक्रीडामतिचिन्ताञ्च वर्जयेत् इति ॥ ८६ ॥ भा.टी.—रसायन-सेवनकाल में मनुष्य को मिथ्या आहार, मिथ्या विहार, द्रवपदार्थों का अधिक सेवन, नदी में तैरना तथा अधिक शयन करना, क्रोध करना, दुःखानुभव करना, किसी चीज की अत्यधिक इच्छा, सहसा अत्यधिक हर्ष,