रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १५ ] रसतरङ्गिणी सिद्धौषधप्रयोगाच्च रोगशान्तिर्यदा भवेत् । मृताभ्रमुख्ययोगांश्च तदा संयोजयेद्भिषक् ॥ ८३ ॥ क्षत्रीकृतनिजकायः कामं शाल्योदनादिपथ्याशी । लब्धबलो रसभोक्ता विदधीत रसायनं प्राज्ञः ॥ ८४ ॥ तदेतदाह-पश्चात् सिद्धौषधैर्यत्नाद्रोगशान्तिं प्रकल्पयेत्, यदाहुः-“स्निग्ध- स्विन्नविरिक्तं यन्नीरुजं सिद्धभेषजैः । एतत्क्षेत्रं समासेन रसबीजवपनक्षमम्” इति । अथ पञ्चकर्मापवादो देशकालादियोग्यतावशात् यदीति-“पञ्चकर्मभयत्रस्तैः सुकुमारैर्नरैरिह । रेचनान्ते इदं सेव्यं सर्वदोषापनुत्तये ॥” इत्यपि केचिदाहुः । समयज्ञः कालविशेषयोग्यताज्ञाता सिद्धान्तज्ञाता वा । तथा चाहुः-“मृताभ्रं भक्षयेन्मासमेनमादौ विचक्षणः । पश्चात्संयोजयेद्देहे क्षेत्रीकरणमिच्छतः ॥” इति तदेतदाह मृताभ्रमुख्ययोगांश्चेत्यादि ॥ ८०-८४ ॥ भा.टी.-रसायन सेवन कराने के लिए पहिले मनुष्य को पञ्चकर्म द्वारा शुद्ध कर लें । पञ्चकर्म के पश्चात् उचित समय तक पथ्य सेवन करायें और फिर पूर्ण सोच-विचार के साथ सिद्ध औषधियों से वर्तमान रोग को दूर करें । यदि रसायन सेवन करनेवाला मनुष्य बालक हो अथवा कृश या क्षीण हो उसे पञ्चकर्म (सम्पूर्ण) न करावें, किन्तु उसे समय के अनुसार युक्तिपूर्वक रेचन ही करायें अथवा रेचन कराना भी उचित न हो तो इसे भी न करायें । क्योंकि इससे और भी दुर्बलता बढ़ने का डर रहता है । विरेचन अथवा पंचकर्म के अनन्तर सिद्ध औषधियों के प्रयोग से उसके वर्तमान कष्ट को शान्त करें । सिद्धप्रयोग से रोगशान्ति होने के बाद उसे अभ्रकभस्म आदि के मुख्य-मुख्य योगों का सेवन करायें । उक्त क्रम से शरीर को रसायनेोपयोगी उत्तम क्षेत्र बनाते हुए शालि चावल आदि पथ्य भोजन कराने चाहिये । जब शरीर में बल आ जाय तब उसे रसायन का सेवन आरम्भ करायें ॥ ८०-८४ ॥ रसायनेोचितो रसः हिरण्यजीर्णो घनसव्वजीर्णो वज्रादिजीर्णोऽप्यथवा मृतश्च । रसायनार्थं हि रसो नितान्तं प्रशस्यते ह्यत्र रसागमज्ञैः ॥ ८५ ॥ भा.टी.-रसायनप्रयोग के लिये रसशास्त्रज्ञ लोग स्वर्णजारित या अभ्रक सत्वजारित अथवा वज्र आदि जारित पारद का अथवा केवल विशुद्ध मृत पारद का प्रयोग उत्तम मानते हैं ॥ ८५ ॥