रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमस्तरङ्गः १६७ यति अन्यथा तु हानिर्वर्ण्यते देहसिद्धिर्न तस्य स्यात् इति । तदेतदुक्तं सुबीजम- पीति ॥ ७५-७८ ॥ भा.टी.—जो औषधि प्रयोग करने पर शारीरिक तथा मानसिक रोगों को नष्ट करे, जिससे शीघ्र आनेवाला बुढ़ापा रुक जाय, जिससे मेधा (बुद्धि) वृद्धि, शारीरिक धातुओं की पुष्टि और नेत्रों की ज्योति बढ़ती हो उसे रसायन औषधि कहते हैं । रसायन सेवन करने के पूर्व शरीर को उपयुक्त क्षेत्र (जैसे बीज बोने के पूर्व जमीन को तैयार किया जाता है) बनाकर रसायन का विधिपूर्वक सेवन करने से और सेवनकाल में लघु अल्प पथ्याहार करने से अवश्य रसायन का फल (रोगनाश) मिलता है । जो मनुष्य अपने शरीर को रसायन सेवनोपयोगी क्षेत्र किये बिना ही रसायन सेवन करने लगता है उसे रसायन का कोई फल नहीं मिलता, किंतु इससे उसे और कष्ट हो जाता है । कृषि-विद्या के द्वारा परीक्षित और संस्कृत तथा सुन्दर नवीन बीज को यदि ऊसर जमीन में बो दिया ( उगाया ) जाय तो उसमें से किसी तरह अंकुर नहीं निकल सकता है इसी तरह यदि वैद्य बिना पञ्चकर्म ( वमन, विरेचन, निरूहण, अनुवासन, नस्य ) किये हुए मनुष्य को रसायन सेवन कराये तो उसका कोई फल नही होगा ॥ ७५-७८ ॥ क्षेत्रीकरणस्य स्वरूपम् सञ्जातपञ्चकृत्यस्य जैत्रैर्यद् गदनाशनम् । रसायनादौ तत्प्राज्ञैः क्षेत्रीकरणमुच्यते ॥ ७९ ॥ क्षेत्रीकरणलक्षणम्—जैत्रैर्भेषजैः ॥ ७९ ॥ भा.टी.-रसायन औषधि सेवन कराने से पूर्व मनुष्य को पञ्चकर्म कराकर तत्तद्रोगनाशक औषधि सेवन करने से रोग की शान्ति कर लेना क्षेत्री-करण कहा जाता है ॥ ७९ ॥ क्षेत्रीकरणप्रक्रिया आदौ तु पञ्चकर्माणि कारयित्वा भिषग्वरः । पश्चात्सिद्धौषधैर्यत्नाद्रोगशान्तिं प्रकल्पयेत् ॥ ८० ॥ यदि बालः कृशः क्षीणः स्याद्रसायनसेवकः । तदा तु पञ्चकर्माणि कारयेन्न भिषग्वरः ॥ ८१ ॥ समयज्ञस्तदा युक्त्या रेचनं कारयेन्न वा । ततस्तु सिद्धभैषज्यैर्नौरुजञ्चापि कारयेत् ॥ ८२ ॥