भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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१६६ रसतरङ्गिणी मूर्वास्वरस में पारदभस्म मिलाकर खिलाने और शरीर में लेप करने से मसूरिका रोग शान्त हो जाता है। स्थावर तथा जंगम विषों के प्रभाव को शरीर से दूर करने के लिये पारदभस्म को कुमारीमूलस्वरस अथवा चौलाईस्वरस के साथ सेवन कराना चाहिये। विषपीड़ित मनुष्य को विष से मुक्त करने के लिए पारद भस्म को चौलाई के स्वरस में मिलाकर नस्य देना या पिलाना चाहिये। कर्पूर को गोबर के रस से सात भावना देकर इसमें पारदभस्म मिला लें, इसका शरीर में लेप करने से अनेक प्रकार के स्थावर विषों का प्रभाव नष्ट हो जाता है। पुनर्नवामूल और बीजों को मनुष्य के मूत्र में पीसकर उसमें पारदभस्म मिलाकर बिच्छू के दंश पर लेप करने से विष शीघ्र उतर जाता है। बाँझक- कोड़े की मूल और फल के साथ पारदभस्म पीसकर प्रयोग करने से स्थावर तथा जंगम दोनों प्रकार के विष उतर जाते हैं। विषैले चूहों के विष को नष्ट करने के लिए पारदभस्म को कैंथ का गूदा और देवदाली के फल के साथ पीसकर लेपादि करने अथवा घर का धुँआ और मैनफलचूर्ण के साथ अथवा शरपोंखाबीज चूर्ण के साथ पारदभस्म मिलाकर निरन्तर कुछ काल तक लेप आदि करना चाहिये। काँसे के पात्र में पारदभस्म को सोंठचूर्ण मिलाकर पान के रस से पीसकर लेप करने से बिच्छू काटने की भयंकर पीड़ा नष्ट हो जाती है ॥ ४१-७४ ॥ अथ रसायनादौ पारदसेवन विधिः यद्याधिव्याधिविध्वंसि वयसः स्थापकन्तथा । मेध्यं वृष्यं तथा नेत्र्यं भेषज्यं तद्रसायनम् ॥७५॥ क्षेत्रीकृत्य निजं देहं सेवेतेह रसायनम् । विधिना मितपथ्याशी देहसिद्धिं हि बिन्दति ॥७६॥ रसायनं यः कुरुते क्षेत्रीकरणमन्तरा । देहसिद्धिर्न तस्य स्यात् प्रत्युत क्लेशकृद्भवेत् ॥७७॥ सुबीजमपि संस्कृतं कृषिविधानदत्तैरिह प्ररोहति न कर्हिचित् सुविततोषरोप्तं यथा । तथैव सुभिषग्वरैरकृतपञ्चकर्मक्रमे नरे हि न रसायनं फलति जातु संयोजितम् ॥७८॥ रसायनलक्षणं यदिति—प्रायो रसायनं मेधां बलं नेत्रशक्तिं चापि वर्धयति, यथा त्रिफला क्षेत्रीकृतेति—यथा बीजावापयोग्यं विधाय क्षेत्रं पश्चादुप्तं बीजं साधु फलतीति तथा शरीरमपि रसायनोपयोगि भवति विरेकादिशुद्धमिति दर्श-