भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 799 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 213

सप्तमस्तरङ्गः १७३ भी कर देना चाहिये । और सम्भव हो तो रोगी को सुगन्धित शीत तथा मन्दवायु में धीरे-धीरे घुमाना चाहिये और रोगी को चन्द्रमा की शीतल चाँदनी में बैठाकर सुन्दर काव्य की कथायें सुनानी चाहिये । यदि रोगी की छाती में अत्यधिक गर्मी मालूम पड़ती हो तो उसे ठंडे जल के टव में बैठाकर स्नान कराना चाहिये । यदि मानसिक शक्ति दुर्बल मालूम पड़ती हो तो उसे द्राक्षा- सव, अश्वगंधारिष्ट आदि बलदायक आसवारिष्ट पिलाने चाहिये । हर समय अत्यधिक प्यास लगने पर उसे कच्चे नारियल का जल पिलाना और दूध, भात, मिश्री, मक्खन आदि शीत पथ्य देना चाहिये । शरीर के दाह तथा ताप को कम करने के लिये गुडूची, खस, धनियाँ, मुलेठी, पित्तपापड़ा और लालचन्दन; इनका कषाय बना उसमें वंशलोचन तथा मिश्री चूर्ण मिला थोड़ा-थोड़ा करके पिलाना चाहिये । अथवा प्रवालभस्म और वंगभस्म एक-एक भाग, स्वर्णभस्म और मुक्तापिष्टी प्रत्येक चौथाई भाग, वंशलोचन तथा गुडूचीसत्त्व एक-एक भाग मिलाकर इसमें से एक रत्ती से दो रत्ती मात्रा में पेठे के जल के साथ देना चाहिये ॥ १०१-१०४ ॥ अमूर्च्छितामृतसूतभक्षणजन्यक्लेशो गन्धकविधानम् आज्यदुग्धौषधैः शोधितं गन्धकं मात्रया युक्तितो नागवल्लीरसैः । पारदक्लेशितो भक्षयेत्सन्ततं यान्ति दोषा द्रुतं शान्तिमेकान्ततः॥१०५॥ औषधैः भृङ्गराजादिभिः, मात्रया यथोचितया ॥ १०५ ॥ भा.टी.—अमूर्च्छित तथा अमृत (ठीक भस्म न हुआ) पारद के सेवन से उत्पन्न होनेवाले विकारों को दूर करने के लिये, घी और दूध में शोधित गन्धक को योग्य मात्रा में लेकर पान के रस के साथ खिलाने से (दो चार दिन निरन्तर खिलाने से) पारदजन्य सम्पूर्ण विकार शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं ॥ १०५ ॥ कूष्माण्डादिगणः कूष्माण्डम्तुलसी लाक्षा खण्डश्च शतपुष्पिका । लवंगं वत्सनाभश्च तण्डुलीयस्य मूलकम् ॥१०६॥ कूष्माण्डादिगणो ह्येष पूर्वाचार्यैर्निरूपितः । अमूर्च्छितामृतरसविकारकुलकण्डनः ॥१०७॥ कूष्माण्डादिगणोत्थैर्द्विगुणेनैकेन गन्धकम् । माषद्वयं भक्षयित्वा ततो गव्यं पयः पिबेत् ॥१०८॥ पारदस्य विकारा ये भेषजानां शतैरपि । शान्ति न यान्ति तत्रेमं योगं दद्याद्भिषग्वरः ॥१०६.॥