रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७४ रसतरङ्गिणी काकमाचीरसः पीतः प्रत्यहं तोलकोन्मितः । निहन्ति मासमात्रेण विकारान् दुष्टसूतजान् ॥११०॥ नागिनीदलकल्केन युक्तेन सुरसाद्रवैः । गात्रलेपाय वितरेद् गन्धं रसचिकित्सकः ॥१११॥ इति पारदमारणविज्ञानीयो नाम सप्तमस्तरङ्गः कूष्मांडादिगणः—शरीरांत् पारदावशेषांशपातनोपयोगी निर्दिष्टः । खंडः सितशर्करा, वत्सनाभो विषविशेषः । एतद्गणसेवनप्रकारः कूष्माण्डादिगणो- द्दिष्टेति । जैत्रेणैकेन अन्यतमोषधेन । स्पष्टमन्यत् । "यद्यज्ञानात्कथमपि नागादि- कलङ्कितो रसो भुक्तः । तत्स्त्रावणाय विज्ञः पिवेच्छिफां कारवेल्लिभवाम् ॥" इत्यप्याहुः ॥ १०६–१११ ॥ भा.टी.—पेठा, तुलसी, लाख, खांड, सौंफ, या गुलाब के फूल, लौंग, वत्सनाभविष, चौलाई की जड़; इनको-पूर्वाचार्यों ने कूष्माण्डादिगण कहा है। यह गण (औषधियाँ) अमूर्च्छित और अमृत-पारदभक्षणजन्य सम्पूर्ण विकारों को नष्ट करता है। इसके अतिरिक्त कूष्माण्डादिगणोक्त औषधियों में किसी एक औषधि के साथ दो माशे शुद्ध गन्धक खिलाकर अनुपान में गाय का दूध पिलायें तो इसके द्वारा वे पारदविकार, जो सैकड़ों औषधियों से भी अच्छे न हुए हों, तो भी शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं। यदि शरीर से अशुद्ध पारद का विष कुछ अंश में रह गया हो तो ऐसी अवस्था में एक मास तक मकोय का स्वरस एक तोला मात्रा में प्रतिदिन पिलाने से उसके सब बचे हुए अंश बाहर निकल आते हैं। यदि अशुद्ध पारद के सेवन से शरीर में फोड़ा-फुन्सी आदि विकार उत्पन्न हो गये हों तो पान के पत्ते तुलसी के रस में गन्धक पीसकर सारे शरीर में लेप करें। इससे त्वक्-रोग शान्त हो जाते हैं ॥ १०६–१११ ॥ नोट—दुष्टपारद या नाग आदि दोषयुक्त पारद के सेवन से होनेवाले विकारों में करेले की जड़ घोटकर पिलाने से भी शीघ्र आराम आता है। यह पारदमारणविज्ञानीय नाम सप्तम तरङ्ग समाप्त हुआ। —:०:— अथ गन्धकविज्ञानीयोऽष्टमस्तरङ्गः अथ गन्धकनामानि गन्धको गन्धपाषाणः गन्धी च रसगन्धकः । सुगन्धिको गन्धिकश्च गन्धः सौगन्धिकस्तथा ॥१॥