भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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षष्ठस्तरङ्गः १७५ पूतिगन्धोऽतिगन्धश्च पामारिः कीटनाशनः । बलिर्बलिवसाख्यश्च कुष्ठारिः शरभूमिजः ॥२॥ शुल्बारिर्नवनीतश्च दैत्येन्द्रो गन्धमादनः । कीटघ्नः क्रूरगन्धश्च स एव परिकीर्तितः ॥३॥ तत्रादौ गन्धकनामानि रसतन्त्रव्यवह्रियमाणानि ॥ १-३ ॥ भा. टी.—रसतन्त्र के व्यवहार में आनेवाले गन्धक के निम्नलिखित नाम पाये जाते हैं—गन्धक, गन्धपाषाण, गन्धी, रसगन्धक, सुगन्धिक, गन्धिक, गन्ध, सौगन्धिक, पूतिगन्ध, अतिगन्ध, पामारि, कीटनाशन, बलि, बलि-वसा, कुष्ठारि, शरभूमिज, शुल्बारि, नवनीत, दैत्येन्द्र, गन्धमादन, कीटघ्न, क्रूरगन्ध ये सब नाम गन्धक के हैं ॥ १-३ ॥ अथ गन्धकस्वरूपम् निर्मलस्तु रजनीसमप्रभो दीप्तिमांश्च नवनीतकोमलः । कीर्तितो ह्यमलसारसंज्ञको गन्धको रसरसायने वरः ॥४॥ रजनीसमप्रभः पीतवर्णः । अत्र हि चतुर्धा प्राग्भिर्निर्दिष्टो गन्धको न व्यव- हृतः भेदान्तराणामप्राप्यत्वात् । "पुरागन्धक" भेदस्तु रसायनानुपयुक्तत्वान्नोक्त इति ज्ञेयम् । गन्धस्य खटिकारूप आयुर्वेद्प्रकाशकारोक्तो निर्गन्ध एवेति नासौ गन्धक इति विभावयन्तु विज्ञाः ॥ ४ ॥ भा.टी.—गन्धक की चतुर्विध जाति में से प्रायः सर्वोपलब्ध आमलासार गन्धक साफ, हरिद्रा के समान कांतिवाला, चमकीला, मक्खन सदृश-कोमल होता हैं। यही आंवलासार गंधक रस तथा रसायनप्रयोगों में उत्तम माना जाता है ॥४॥ वक्तव्य—यद्यपि तन्त्रान्तर में श्वेत, रक्त, पीत और कृष्ण भेद से गन्धक चार प्रकार का पाया जाता है, परन्तु इनमें से रक्त तथा कृष्ण वर्ण गन्धक के अप्राप्य होने से इनका वर्णन न करके केवल आंवलासार गंधक का ही यहाँ पर वर्णन किया गया है । बाजार में पाया जानेवाला नैतुआगंधक भी आंवला- सारगंधक का ही मिश्रण होने से पृथक् वर्णन नहीं किया गया । अशोधितगन्धकदोषनिरूपणम् अशोधितः सुगन्धिकस्तनौ तनोति तापकम् । भृशञ्च चित्तविभ्रमं करोति रक्तजान् गदान् ॥५॥ प्रसन्नतां सुरूपतां शरीरबन्धचारुताम् । प्रभां बलञ्च नाशयत्यतो विशोधयेत्तु तम् ॥६॥