रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७६ रसतरङ्गिणी अशुद्धगन्धकस्य सविषत्वात् तत्सेवनाद् विकारास्तनुतापादयः स्पष्टाः॥५-६॥ भा.टी.—अशोधित गन्धक का सेवन करने से शरीर का ताप बढ़ जाता है जिससे चित्त में व्याकुलता तथा शरीर में रक्तविकृतिजन्य रोग उत्पन्न हो जाते हैं। शरीरगठन, सौन्दर्य, कान्ति तथा बल का नाश हो जाता है। अतः इसको शुद्ध करके ही अन्त:प्रयोग करना चाहिये ॥५-६॥ अथ गन्धकशोधनस्य प्रथमः प्रकारः दीप्तानलायां सुचिरं हसन्त्यां संस्थापयेन्निर्मललोहपात्रम् । आज्यं विशुद्धं त्वथ गन्धतुल्यं विनिक्षिपेत्तापयितुं रसज्ञः ॥७॥ आज्यं सुतप्तं तु विलोक्य तस्मिन् क्षिपेत्समानं खलु गन्धचूर्णम् । मन्दानलेनाथ विपच्यमानं विद्रावयेद् गन्धकमामयज्ञः ॥८॥ दुग्धपूर्णोदरं पात्रं तनुवस्त्रेण रोधयेत् । विद्रुतं गन्धकञ्चाथ तनुवस्त्रोपरि क्षिपेत् ॥९॥ सारयेद्विधिना गन्धं दुग्धमध्ये यथा पतेत् । दुग्धमध्यगतं गन्धं सम्यक् प्रक्षालयेत्ततः ॥१०॥ एवं वारद्वयं पक्त्वा दुग्धेऽन्यस्मिन् पुनः क्षिपेत् । एवं त्रिवारं संशुद्धो गन्धको विमलो भवेत् ॥११॥ अनेनैव विधानेन शतवारं विशोधितः । गन्धको निजगन्धन्तु जहातीह न संशयः ॥१२॥ हसन्त्यां अङ्गारधानिकायाम् । अत्र दुग्धमत्यन्ततप्तं ग्राह्यमन्यथा शीतदुग्धे निर्वापणेन ससुषिरं आज्यदुग्धान्वितं गन्धं जायते । अत्युष्णे क्षिप्तन्तु कठिनब- न्धमसुषिरं आज्यदुग्धरहितञ्चेति विशेषः । अत्र च गन्धकवर्णरक्षा मन्दानल- पाकाद्विधेया, अन्यथा खरपाके गुणवर्णहानी भवतः इति ॥७-१२॥ भा.टी.—गन्धकशोधन के लिये कोयलों की आगवाली अँगेठी में एक साफ लोहपात्र या लोहे की कढ़ाई रखें, अब इसमें गन्धक के बराबर भाग शुद्ध घी डालकर गरम करें। जब घी अच्छी तरह खूब इसमें गरम हो जाय तो इसमें घी के समभाग गन्धक का चूर्ण डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकाते हुए गन्धक को पिघलायें। अब इस पिघले हुए गन्धक को, एक पात्र में दूध भर उसके मुख पर एक बारीक छानने के योग्य कपड़ा बांध दें और इसके ऊपर डाल दें। दूध में पड़े हुए गन्धक को निकाल गरम जल से अच्छी तरह धो लें और फिर