रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२ अष्टमस्तरङ्गः १७७ उक्त विधि से पिघलाकर दूसरे नूतन दुग्धवाले पात्र में डाल दें। इस प्रकार तीन बार पिघलाकर दूध में डालें तो गन्धक शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार यदि गन्धक को सौ बार पिघलाकर दूध में डाला जाय तो उसमें गन्धक की गन्ध नहीं रहने पाती है ॥ ७-१२ ॥ वक्तव्य—पात्र में दूध गरम होना चाहिये, ठंढ़े दूध में गन्धक डालने से उसके छिद्रों में दूध और घी भर जाता है जो गन्धक को सुगन्धित कर देता है। तेज अग्नि में गन्धक पिघलाने से गन्धक जल जाता है और उसका वर्ण कुछ काला पड़ जाता है। अत्यधिक पक जाने पर वह खरपाक होने से औषधि के काम का नहीं रहता है। द्वितीयः शोधनप्रकारः दुग्धपूर्णोदराद्धें तु घृतपात्रे विनिःक्षिपेत् । तन्मुखं तनुवस्त्रेण त्वहतेनाथ रोधयेत् ॥१३॥ चूर्णीकृतं गन्धकञ्च वसनोपरि विन्यसेत् । आच्छादयेच्च विधिना खर्परेणाथ गन्धकम् ॥१४॥ सवस्त्रकुट्टितमृदा तयोः सन्धिं निरोधयेत् । आकण्ठं भाजनं गर्ते निधाय भिषजाग्रणीः ॥१५॥ वन्योपलैस्तु ज्वलनं ज्वलयेद् भाण्डमूर्धनि । एवं तु विद्रुतो गन्धो दुग्धे पतति तत्क्षणात् ॥१६॥ गन्धं शीतं सुविज्ञाय क्षालयेत्सलिलेर्भृशम् । एवमैकेन वारेण गन्धकः निर्मलो भवेत् ॥१७॥ अथ द्वितीयः शोधनप्रकारः। दुग्धपूर्णोदराद्धें तु इत्यादिना—अहतेन नवी- नेन स्वच्छेन च। सलिलैरिति उष्णसलिलैः क्षालनं दुग्धादिमन्धनाशाय नैर्म- ल्याय च इति एवं शोधनफलञ्च—“एवं विशोधितो गन्धः पाषाणानम्बरे त्यजेत्। घृते विषं तृणाकारं दुग्धे शुद्धिमुपैति च ॥” इत्याहुः प्राञ्चः ॥१३-१७॥ भा.टी.—एक पात्र में आधा दूध भरकर उसमें घृत डाल दें और पात्र के मुख को एक बारीक बिना फटे हुये वस्त्र से ढककर अच्छी तरह बांध दें, अब इस कपड़े पर गन्धकचूर्ण डालकर एक मिट्टी के खर्पर अथवा तवे से इस गन्धक को ढककर दुग्धपात्र और ढक्कन की सन्धि को गाढ़ी मिट्टी और कपड़े से लेप कर दें अब इस पात्र को गले तक एक गढ़े में गाड़कर तवे के ऊपर जंगली उपलों से अग्नि जलायें। इस प्रकार ऊपर के अग्निताप से गन्धक पिघल कर