भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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७८ | रसतरङ्गिणी

शीघ्र ही दूध में जा गिरता है। जब पात्र का गन्धक ठंडा हो जाय तो इसे निकालकर गरम जल से धो डालें। इस प्रकार एक ही बार में गन्धक शुद्ध हो जाता है ॥ १३-१७ ॥ वक्तव्य—दूधवाले पात्र के मुख पर कपड़ा बाँधकर पात्रमुख के किनारों पर चारों तरफ एक या दो अंगुल ऊँची गोल गारे की दीवार सी बना लें, अब इसके ऊपर तवा या थाली टिकाकर इसको अच्छी तरह से कपड़मिट्टी कर दें। पात्र में घृत गन्धक के समभाग डालना उत्तम होता है। इस प्रकार से शुद्ध किया हुआ गन्धक छोटे-छोटे दानोंवाला मुक्ताकार होता है । तृतीयः शोधनप्रकारः सार्षपं तिलजं वापि कौसुम्भं तैलमुत्तमम् । कटाहे निक्षिपेद्युक्त्या वह्निं प्रज्वालयेदधः ॥१८॥ तैलं सुतप्तं विज्ञाय तत्समं गन्धचूर्णकम् । तैले विनिक्षिपेत्प्राज्ञः पचेन्मन्दाग्निना बलिम् ॥१९॥ विद्रुतं तु बलिं ज्ञात्वा द्रुतं क्षीरे बिनिक्षिपेत् । प्रक्षालयेत्तत्तस्तोयैर्विशुद्धो जायते बलिः ॥२०॥ अथ तृतीयः-तैलद्वारा गन्धकशोधनं तत्तद्विशेषयोगयोग्यताथम् ॥१८-२०॥ भा.टी.—सरसों अथवा तिलों के तेल को अथवा बरें के तेल को एक कढ़ाई में डालकर चूल्हे पर रखकर अग्नि जलावें। जब तेल गरम हो जाय तो उसमें तेल के बराबर भाग का चूर्ण डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकावें। जब गन्धक पिघल जाय तो उसे शीघ्र ही एक पात्र में रखे हुये दूध में डाल दें। ठंडा होने पर गन्धक को निकाल कर गरम जल से धोकर सुखा लें ॥ १८-२० ॥ चतुर्थः शोधनप्रकारः विधाय चूर्णं गन्धस्य द्रावयेल्लोहभाजने । भृङ्गराजरसे क्षिप्त्वा क्षालयेच्चाथ वारिभिः ॥२१॥ अनेनैव विधानेन सप्तवारं विशोधयेत् । भोक्तुं पृथक् त्रिवारन्तु योगार्थं भिषजां वरः ॥२२॥ चतुर्थः शोधनप्रकारो-भृङ्गरसादिना पर्पट्याद्युपयोगी व्याख्यायते ॥२१-२२॥ भा. टी.—गन्धक के चूर्ण को एक लोहे के पात्र में पिघलाकर भृंगराज के स्वरस में डाल दें जब ठंडा हो जाय तो उसे निकाल गरम जल से धोकर पुनः