रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंउक्त पात्र में गरम करके भृंगराजस्वरसं में डालें । इस प्रकार सात बार पिघला कर भांगरे के स्वरस में डालने से वह शुद्ध हो जाता है। इस प्रकार सात बार शुद्ध किया हुआ गन्धक पर्पटी आदि योगों में डालने के काम आता है॥२१-२२॥ खल्वे सौगन्धिकं क्षिप्त्वा दृढं सम्पे षयेत्ततः । श्लक्ष्णचूर्णं ततो ज्ञात्वा चतुष्पलमितं बलिम् ॥२३॥ यन्त्रे डमरुसंज्ञे च पचेद्यामचतुष्टयम् । ऊर्ध्वलग्नं बलिं पीतं यत्नतो ह्यवतारयेत् ॥२४॥ एवं संशोधितो गन्धः शुद्धमायात्यनुत्तमाम् । पाषाणादिकदोषांश्च सर्वथा विजहात्ययम् ॥२५॥ पञ्चमः शोधनप्रकारः—निःस्नेहोज्ज्वलः स्वर्णवङ्गान्तर्धूममकरध्वजादिनि- र्माणोपयोगी । अत्र मध्याग्निना पाकः प्रायः, यतो मन्दाग्निना नोर्ध्वं लगति गन्धः ॥ २३-२५ ॥ भा.टी.—एक खरल में गन्धक डालकर उसे खूब अच्छी तरह से पीस लेवें, जब इसका बारीक चिकना-सा चूर्ण हो जाय तो इसमें से चार पल प्रमाण गन्धक लेकर डमरुयंत्र में डालकर सन्धलेप करके चार पहर मध्यम- मध्यम अग्नि से पकावें । चार पहर के बाद स्वांगशीतल होने पर यंत्र को खोल कर ऊपर के पात्र के भीतर लगेहुए पीतवर्ण गन्धक को सावधानी से निकाल लें । इस प्रकार शुद्ध करने से गन्धक विशेष रूप से शुद्ध माना जाता है । क्योंकि इसमें पाषाण आदि उड़कर नहीं जा सकते हैं । यह साफ और दूध- या घी के संयोग से रहित होता है ॥ २३-२५ ॥ षष्ठः शोधनप्रकारः दग्धचूर्णोपलस्येह भागमेकं समाहरेत् । त्रिगुणे सलिले चाथ युक्त्या निर्वापयेद् भिषक् ॥२६॥ भागद्वयं गन्धकस्य त्रयोदश जलस्य च । भागान् संगृह्य चुल्ल्याञ्च निधाय द्रावयेद् भृशम् ॥२७॥ कपिलाभं ततो ज्ञात्वा सारयेत्पृथुवाससा । मृत्पात्रे काचलिप्ते वा काचपात्रे निधापयेत् ॥२८॥ शीतलञ्चाथ विज्ञाय लवणद्रावकं भिषक् । शनैः शनैः क्षिपेद्यावद् गन्धकस्तु पतत्यधः ॥२६॥