रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८० रसतरङ्गिणी अधःस्थं गन्धकं ज्ञात्वा जलांशमन्यभाजने । स्थापयित्वा ततो गन्धं क्षालयेत्सलिलैर्भृशम् ॥३०॥ सौगन्धिकं विशोष्याथ श्लक्ष्णचूर्णं तु कारयेत् । एवं संशोधितं गन्धं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥३१॥ षष्ठः शोधनप्रकारो नव्यपरिभाषासम्मतः। दुग्धेति—चूर्णोपलं सुधापाषाणम्। जलस्य चूर्णोदकस्य, लवणद्रावकं वक्ष्यमाणनिर्माणप्रकारम्, स्पष्टमन्यत्॥२६-३१॥ भा.टी.—अनबुझा चूने का पत्थर एक भाग लेकर इसको तीन भाग जल में बुझा लें, जो स्वच्छ जल ऊपर आये उसे युक्ति से पृथक् कर लें। इस प्रकार प्राप्त किया हुआ चूने का पानी तेरह भाग और गन्धक दो भाग लेकर दोनों को एक पात्र में डालकर चूल्हे में तीव्र अग्नि से पिघलायें। जब गन्धक और जल अग्निताप से कपिल वर्ण का दिखाई दे तो इसे एक मोटे कपड़े से छान एक कांचलिप्त मिट्टी के पात्र में अथवा कांच के पात्र में रख दें। जब यह ठंडा हो जाय तो इसमें धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा करके लवणद्रावक मिलायें जब तक कि सब गन्धक नीचे बैठ जाय। गन्धक के नीचे बैठने पर ऊपरी जलीयांश को एक दूसरे पात्र में अलग कर लें। और गन्धक को अच्छी तरह कई बार धोयें और सुखाकर इसका सूक्ष्म चूर्ण करके रख लें। इस प्रकार शुद्ध किये हुये गन्धक को बिना संकोच के योगों से काम लावें ॥ २६-३१ ॥ अथ सुधालवणम् पृथक् कृतं जलांशन्तु संशोष्याथ विचूर्णयेत् । सुधालवणमित्युक्तं रक्तस्रुतिहरं परम् ॥३२॥ सुधालवणम्—सुगमम् ॥ ३२ ॥ भा.टी.—गन्धक के ऊपर से पृथक् किये हुये जलीयांश को सुखाकर चूर्ण कर लें, इसी को सुधालवण कहते हैं। यह प्रयोग करने पर शरीर के रक्त-स्राव को बन्द करने में उत्तम माना जाता है ॥३२॥ अथ गन्धकस्य गन्धनाशनप्रकारः सुगन्धिकं विचूर्णीतं पचेत्तु दुग्धमध्यगम् । यदा घनत्वमाप्नुयात्तदा सुवर्चलारसम् ॥३३॥ क्षिपेदथो पुनः पचेच्छनैः शनैर्भिषग्वरः । जले फलत्रिकोद्भूवे विनिक्षिपेत्ततो बुधः ॥३४॥