रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 221, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंअष्टमस्तरङ्गः १८१ स्वगन्धमत्र गन्धको जहात्यशेषतो द्रुतम् । चिराशनार्थमीदृशं बलिं नियोजयेद्भिषक् ॥३५॥ गन्धकगन्धनाशनप्रकारः सफलः । सुवर्चला सूर्यभक्ता "हुरहुर" इति ख्याता, चिराशनार्थमेतादृशंबलिं प्रयोजयेत् ॥ ३३-३५ ॥ भा.टी.—गन्धक का चूर्ण करके दूध में डालकर पकाने पर जब वह गाढ़ा हो जाय तो इसमें हुलहुल का स्वरस डालकर इसे पुनः धीरे-धीरे मन्द-मन्द अग्नि में पकाकर त्रिफलाक्वाथ में डालकर ठंडा कर लें । इस प्रकार पिघलकर सुवर्चला रस और त्रिफलाक्वाथ से शुद्ध होने से गन्धक अपनी स्वाभाविक सम्पूर्ण गन्ध को छोड़ देता है । इस तरह शुद्ध ( गन्ध दूर की हुई ) की हुई गन्धक चिरकालतक खाने के काम आती है ॥ ३३-३५ ॥ अथ विशुद्धगन्धकस्य गुणाः गन्धः शुद्धो गर-विषहरः क्षुद्रकुष्ठेभसिंहः कासं श्वासं हरति नितरां दद्रुदावानलश्च । आधिव्याधिप्रशमनपटुः काममामं निहन्यात् दिव्यां दृष्टिं वितरतितरां जाठराग्निं प्रसूते ॥३६॥ सुगन्धिकः सुनिर्मलः सरो रसायनोत्तमः । कटूष्णवीर्यपाचनो रसेन्द्रवीर्यवर्द्धनः ॥३७॥ विकारानाशयत्याशु दुष्टसूताशनोत्थितान् । दुष्टाहिभक्षणोत्थांश्च शिरोदाहादिकानपि ॥३८॥ अथ विशुद्धगन्धकगुणाः—गरं कृत्रिमं विषम् । आमं अपक्वरसम् । सरः मल- सारकः, दुष्टाहिभक्षणं अशुद्धसीसकसेवनं तत्समुत्थान् शिरोदाहप्रभृतीन्॥३६-३८॥ भा. टी.—शुद्ध गन्धक प्रयोग करने पर शरीर का गरविष नष्ट हो जाता है और क्षुद्र कुष्ठ, त्वग्रोग नष्ट हो जाते हैं । कास श्वास रोग को दूर करता है और दाद के लिये दावानल ( वन की अग्नि के सम ) है । मानसिक तथा शारीरिक रोगों को दूर करता है और आम ( अपरिपक्वरस) को नष्ट करता है । चिरकाल तक उचित अनुपान तथा सहपान के साथ सेवन करने से नेत्रों की ज्योति को बढ़ाता है और जठराग्नि को दीप्त करता है । शुद्ध गन्धक (आंतों की मलसरण क्रिया लेक्जेटिव के लिये ) उत्तम रसायन औषधि है । इसमें कटु रस होता है, वीर्य में यह उष्णप्रकृति का और पाचन गुणवाला है । इसके योग से पारद की शक्ति बढ़ जाती है । विकृत तथा अशुद्धपारद खाने से होने-