रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमस्तरङ्गः १८५ कषाय के साथ प्रयोग करने पर आराम आता है। पक्व कदलीफल के साथ गन्धक सेवन करने से त्वचा के रोग नष्ट होते हैं। चित्रमूलकचूर्ण के साथ गन्धक-सेवन से दुर्बलता नष्ट होती है। अर्शोरोगजन्य गुदविकार में गन्धक को तिलचूर्ण के साथ सेवन किया जाता है। अथवा मुलैठी, खांड, सनायपत्ती, तथा सौंफ इनके समभाग चूर्ण मिला सेवन करने से गुदविकार शान्त होता है। कफ के रोगों को नष्ट करने के लिये गन्धक को शुद्ध गूगल और त्रिफला- चूर्ण के साथ गोली बनाकर एक मासा मात्रा में गरम जल के साथ दो मास तक सेवन किया जाता है। मालकंगुनीबीज-तैल, वचाचूर्ण तथा ताजे दही का मक्खन; इन तीनों को समभाग में लें और इन तीनों के बराबर भाग नष्ट गन्ध किया हुआ शुद्ध गन्धकचूर्ण मिलाकर एक मास तक सेवन करने से तीव्र यक्ष्मा, आँत्र शोष, भयंकर कण्ठमाला रोग नष्ट होते हैं। स्वस्थ शरीर में एक मास तक उक्त योग का सेवन करने से नेत्रों की ज्योति में वृद्धि, वीर्यवृद्धि, मन में सन्तुष्टि, शरीर में पर्याप्त मात्रा में पुष्टि होती है। इससे मनुष्य बड़ा साहसी, बलवान् तथा सर्वरोग रहित हो जाता है। एक कोल ( आठ आना भर ) प्रमाण ऊर्ध्वपातित शुद्ध गन्धक और नौ कोल ( ४॥ भर ) स्वच्छ खांड लेकर दोनों को एकत्र खूब अच्छी तरह पीसकर एक साफ काँच की शीशी में रख लें और उसका डाट बन्द कर दें। इसकी एक रत्ती मात्रा लेकर शीतल जल के साथ सेवन करने से वीर्य की खराबी, जल समान शुक्र का पतलापन, तथा शुक्र में गन्ध का अभाव आदि विकार दूर होकर शुक्र शुद्ध, गाढ़ा, मधु- गन्धि होकर सन्तानोत्पत्ति करने के योग्य हो जाता है। मुरदासँग, सुहागा, कपूर, तथा शुद्ध गन्धक; इन सबको समभाग में लेकर एकत्र चूर्ण बना ले। अब इस चूर्ण को नारियल के तैल में मिलाकर शरीर में कुछ दिन निरन्तर मलें तो सात दिन में पुरानी तथा भयंकर पामा (खुजली) नष्ट हो जाती है। सुहागा, सालकी राल, फिटकरी और शुद्ध गन्धक; इन सबको समभाग में लेकर एकत्र चूर्ण करके इसको नींबू के रस के साथ शरीर में कुछ दिन निरंतर मलें तो शीघ्र ही दाद नष्ट हो जाता है। शरीर में बल और वीर्यवृद्धि के लिए शुद्ध गन्धक का सेमल की कोमल छोटी-छोटी मूसलीचूर्ण के साथ मिला दुग्धानुपान से एक मास तक सेवन करना चाहिये। गलित कुष्ठ ( महाकुष्ठ ) को नष्ट करने के लिये शुद्ध गन्धक को मधु से चाटकर आँवले का स्वरस अनुपान के रूप में सेवन करना चाहिये ॥ ४०-५८ ॥ वक्तव्य—मन्दाग्नि तथा अजीर्ण के उपद्रवों को शान्त करने के लिए