रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमस्तरङ्गः १८७ आधा तोला, सुहागा, कपूर प्रत्येक दो मासे लेकर पीसकर सिकथतैल में मिला चौड़े मुख की काँच की शीशी में रख लें। इसे गन्धक मलहर कहते हैं। इसके लेप करने से अत्यन्त भयङ्कर पामा नष्ट हो जाती है ॥ ६३-६५ ॥ प्रथमो गन्धककल्पः विशोधितः सुगन्धिको वराऽज्यभृङ्गसंयुतः । समाक्षिको विधानतस्त्रिमासमात्रसेवितः ॥६६॥ निहन्ति दारुणान् गदान् चिरोत्थितानपि द्रुतम् । करोति लोचनद्वयं विकाशि गृध्रनेत्रवत् ॥६७॥ दुग्धं सशर्करं कोष्णं त्वोदनं षष्टिकोद्भवम् । शीतवीर्यं भवेद्यच्च पथ्यमेतत्समासतः ॥६८॥ गन्धककल्प इति रसायनप्रायः प्रयोगः कल्प इत्युच्यते ॥ ६६-६८ ॥ भा.टी.-शुद्ध गन्धक को उचित मात्रा में लेकर उसमें त्रिफलाचूर्ण, गोघृत और भृंगराज का स्वरस मिलाकर मधु के साथ विधिपूर्वक तीन मास तक सेवन करने से भयंकर और पुराने रोग भी शीघ्र ही शान्त हो जाते हैं। इसके सेवन से दृष्टि गीध के समान तीव्र हो जाती है। इसके सेवनकाल में साठी चावलों के भात में दूध और खाँड मिला गुनगुना भोजन करना चाहिये। इसके अति- रिक्त अन्य शीतवीर्य द्रव्य भी इसमें पथ्य होते हैं ॥ ६६-६८ ॥ द्वितीयो गन्धककल्पः नवनीताह्वयः शुद्धश्चूर्णमामलकोद्भवम् । तुल्यमेतद् द्वयं ग्राह्यं सप्तवारं विधानतः ॥६९॥ रसेन भावयेद् धात्र्याः शाल्मल्याश्च द्रवैस्तथा । शर्करामधुसंयुक्तं लिहेदनु पयः पिबेत् ॥७०॥ गगनाननमासनिषेवणातः स्थविरोऽपि मनोजशराभिहतः । सुरतेऽविरतं खलु विह्वलयन् रमयेद्रमणीशतकं सरसः ॥७१॥ गगनाननमासाः त्रिंशन् ( ३० ) मासाः ॥ ६६-७१ ॥ भा.टी.-शुद्धगन्धक एक भाग, आमलकीचूर्ण एक भाग लेकर दोनों को एकत्र करके आँवलास्वरस तथा शाल्मलीस्वरस की पृथक्-पृथक् सात भावना देकर सुखा लें। इसमें से प्रतिदिन एक मासा मात्रा में लेकर खाँड और शहद में मिलाकर खायें और इसके पीछे दूध पीवें। इस विधि से ३० तीस मास तक इस योग का सेवन करने से बूढ़ा मनुष्य भी अत्यन्त कामी हो जाता है ॥६६ ७१॥