रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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तृतीयो गन्धककल्पः माषार्द्धं विमलं गन्धं कोषोष्णेन पयसा पुमान्। भक्षयेत्प्रत्यहं मासं वीर्यवृद्धिः प्रजायते ॥७२॥ षण्माससेवनाच्चास्य दिव्यां दृष्टिश्च विन्दति । सुवर्णवर्णसंकाशां दीप्तिं स तनुते तनौ ॥७३॥ भा.टी.—आधा मासा शुद्ध गन्धक को प्रतिदिन प्रातःकाल गुनगुने दूध के साथ एक मास तक सेवन करने से शरीर में वीर्य की वृद्धि होती है । छः मास तक सेवन करने से उसकी दिव्य दृष्टि हो जाती है अर्थात् नेत्रों की ज्योति तीव्र हो जाती है । शरीर का रंग स्वर्ण के समान निखर आता है ॥७२-७३॥ चतुर्थो गन्धककल्पः माषार्द्धं गन्धकं शुद्धं तिलतैलेन भक्षयेत् । नित्यं चोष्णजलेनेह पामादीनवसेचयेत् ॥७४॥ सप्ताहत्रितयादेव पामाद्याः सकला रुजः । हरेत्सुवर्णवर्णाभः कायः संजायते नृणाम् ॥७५॥ गन्धकस्य तैलेन सेवनं त्वग्दोषनाशाय ॥ भा. टी.—शरीर में पामा, कण्डू, विचर्चिका आदि त्वक् रोगों में आधा मासा शुद्ध गन्धक, को तिलतैल के साथ खिलायें और प्रतिदिन पामा आदि रोगयुक्त स्थानों को गरम जल से धोते रहें । इस प्रकार २१ दिन तक गन्धक सेवन और प्रक्षालन क्रिया को करते रहने से उक्त सब रोग नष्ट हो जाते हैं । शरीर स्वर्ण समान कान्तियुक्त हो जाता है ॥ ७४, ७५ ॥ पञ्चमो गन्धककल्पः गन्धकं निर्मलं मागधीगर्भितं पथ्यया संयुतं तुल्यमेतत् त्रयम् । सर्पिषा माक्षिकेणेह माषद्वयं भक्षयेद्यत्नतस्तत्र मासत्रयम् ॥७६॥ भोजनादौ सदा यन्त्रणावर्जितः शीलयेत्प्रत्यहं ब्रह्मचारी नरः । तप्तचामीकरोद्भासिरम्य़ाननः शौर्यवीर्यान्वितो दिव्यदृष्टिर्भवेत् ॥७७॥ तप्तचामीकरोद्भासिरम्य़ानन इतितप्तसुवर्णवच्छोभमान सुन्दरमुखः ॥७६, ७७॥ भा.टी.—शुद्धगन्धक, पिप्पलीचूर्ण और हरीतकीचूर्ण तीनों को समभाग में लेकर एकत्र पीस लें। इसमें से प्रतिदिन दो मासे लेकर चार मासे घी और शहद के साथ तीन महीने तक सेवन करायें । साथ ही सेवन करनेवाला मनुष्य इस काल में ब्रह्मचारी रहे तो उसका शरीर तप्त सुवर्ण के समान कान्तिवाला