भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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अष्टमस्तरङ्गः १८६ हो जाता है। उसके शरीर में बल, पराक्रम के साथ दृष्टि-शक्ति बढ़ जाती है । इसके सेवनकाल में खाने-पीने में कोई विशेष परहेज की आवश्यकता नहीं है ॥ ७६-७७ ॥ षष्ठो गन्धककल्पः तैलसंशोधितं गन्धकं चूर्णितं माषकार्द्धं लिहेत्क्षौद्रमध्यस्थितम् । नाशयेत्सत्वरं क्षुद्रकुष्ठोत्थितां वेदनां दारुणां दीर्घकालोत्थिताम् ॥७८॥ मरिचं गन्धकं पश्चात्तैलेनेह सुपेषयेत् । अपामार्गजलेनापि ततो देहं प्रलेपयेत् ॥ ७९ ॥ घर्मे सम्यक् शोषयित्वा स्नानं कुर्यात् सुभेषजैः । सप्ताहद्वितयेनैव क्षुद्रकुष्ठं व्यपोहति ॥ ८० ॥ मरिचगन्धतैलानां पिष्टं विधाय अपामार्गजलेन सम्मेल्य शरीरे लेपो विधेयः क्षुद्रकुष्ठनाशाय । अयमत्र क्रमः—प्राक् तैलेन गन्धकः पेष्यः, पश्चादपामार्गतोयेन तैलमरिचेन सह गन्धकं पेषयित्वा सकलदेहं विलिप्य घर्मे तिष्ठेत् । ततो मध्याह्ने तक्रभक्तं भुञ्जीत, रात्रौ वह्निसंवा प्रातर्महिष्याङ्गणलेपः, शीतलेन जलेन स्नानम् । एवं पामाकुष्ठनाश इति ॥ ७८–८० ॥ भा. टी.—पूर्वोक्त विधि से तेल में शुद्ध किया हुआ गन्धकचूर्ण आधा मासा मात्रा में लेकर मधु के साथ सेवन करने से शीघ्र ही क्षुद्र कुष्ठों (दद्रु, चर्मदल, पामा आदि) का भीषण कष्ट दूर हो जाता है। इस योग के साथ काली मिर्च, गन्धक तथा सर्षपतैल को एकत्र अपामार्गस्वरस से पीसकर इसका शरीर में लेप करके धूप में बैठकर लेप को सुखायें, पश्चात् खदिर, हरिद्रा आदि औषधियों के जल से स्नान करें । इस प्रकार चौदह दिन करने से क्षुद्रकुष्ठ नष्ट हो जाते हैं ॥ ७८–८० ॥ सप्तमो गन्धककल्पः सौगन्धिकं तु विमलं गृह्णीयाद् भिषजां वरः । ततो गव्येन पयसा त्रिवारं खलु भावयेत् ॥ ८१ ॥ ततः फलत्रिकेणाथ चतुर्जातद्रवैस्तथा । गुडूच्या भृङ्गनीरेण शृङ्गवेररसेन च ॥ ८२ ॥ अष्टवारं पृथग् युक्त्या भावयेद् रसकोविदः । सिद्धे रसायने तुल्यां सितां संयोज्य योजयेत् ॥ ८३ ॥