रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० रसतरङ्गिणी प्रत्यहं सेवितो गन्धो माषमात्रप्रमाणतः । मासमात्रप्रयोगेण निहन्ति विविधान् गदान् ॥ ८४ ॥ धातुक्षयोत्थितान् रोगान् तथा कोष्ठसमाश्रितान् । प्रमेहान् शीर्षजान् रोगान् शूलं कुष्ठादिकानपि ॥ ८५ ॥ क्षाराम्ललवणादीनि कोपादीन् वनितासुखम् । द्विदलानि च शाकानि गन्धसेवी विवर्जयेत् ॥ ८६ ॥ त्रिफलादिशृङ्गवेरान्तैः पृथक् अष्टवारं भावना देया । तुल्यां भावितगन्धक- तुल्याम् । वनितासुखं स्त्रीसंसर्गमित्यर्थः ॥ ८१-८६ ॥ भा.टी.—शुद्धगन्धकचूर्ण लेकर उसे गोदुग्ध की तीन भावना दें । इसके बाद त्रिफलाक्वाथ, चतुर्जात (दालचीनी, तेजपत्र, इलायची, नागकेसर) क्वाथ, गुडूचीस्वरस, भाँगरारवरस और अदरखरस की पृथक्-पृथक् अच्छी तरह आठ भावना दें । अब इस भावित गन्धक में गन्धक-समभाग खाँड मिलाकर पीस लें । इसमें से प्रतिदिन प्रातःकाल एक मासा मात्रा में सेवन करायें तो एक मास तक इसके सेवन से धातुक्षयजन्य कोष्ठ रोग, प्रमेह, शिरोरोग, शूल, कुष्ठ आदि त्वग्-रोग तथा अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं । गन्धक सेवन करनेवाले मनुष्य को इसके सेवनकाल में क्षार, अम्ल, लव- णयुक्त पदार्थ, क्रोध, चिन्ता आदि स्त्री संभोग दाल और शाकों का परिहार करना चाहिये ॥ ८१-८६ ॥ अष्टमों गन्धककल्पः विशुद्धसौगन्धिकचूर्णमादौ विभावयेद् भृङ्गरसैस्त्रिवारम् । ततो घृतक्षौद्रहरीतकीभिः सेवेत नित्यं खलु माषमात्रम् ॥ ८७ ॥ विधिना मितपथ्याशी मासद्वयनिषेवणात् । स्थविरोऽपि स्मराक्रान्तो निर्भरं तरुणायते ॥ ८८ ॥ स्थविरो वृद्धः, स्मराक्रान्तः कामाक्रान्तः, निर्भरं अत्यर्थम् ॥ ८७-८८ ॥ भा.टी.—शुद्धगंधक के चूर्ण को भृंगराजरस की तीन भावना देकर सुखा लें । अब इसमें से एक मासा मात्रा लेकर हरीतकी-चूर्ण घृत तथा शहद के साथ प्रतिदिन प्रातःकाल सेवन करायें । दो मास तक सेवन करते हुए अल्प और पथ्य भोजन करायें । इसके सेवन से बूढ़ा मनुष्य भी अत्यन्त कामी तरुण पुरुष की भाँति शक्तिशाली हो जाता है ॥ ८७-८८ ॥