रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमस्तरङ्गः १६१ नवमो गन्धककल्पः रुबूकतैलसंयुक्तः सकौशिको वरान्वितः । विशुद्धपारदान्वितः सुगन्धिको निषेवितः ॥ ८६ ॥ निहन्ति मासमात्रतो भृशं कफोत्थितान् गदान् । समीरजांश्च पैत्तिकान् चिरोत्थितानपि द्रुतम् ॥ ९० ॥ दृशा खगेश्वरोपमो बलेन भीमसंनिभः । रविप्रभस्तु तेजसा भवेत् स वज्रविग्रहः ॥ ९१ ॥ रुबूकतैलमेरण्डतैलम् । खगेश्वरो गरुडः । वज्रविग्रह इति कठिनदेहः ॥ ८६–६१ ॥ भा.टी.—शुद्धगन्धक में समभाग शुद्धपारद, शुद्धगूगल, त्रिफलाचूर्ण मिलाकर इसको एरण्डतैल में अच्छी तरह मर्दन करके गोली अवलेह-सा बना लें, अब इसको उचित मात्रा में एक मास तक सेवन कराने से पुराने से पुराने कफजन्य, वातप्रकोपजन्य तथा पित्तप्रकोपजन्य रोग शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं । इस योग के सेवन से मनुष्य दृष्टि में गरुड़ के समान, बल में भीम के समान, तेज में सूर्य के समान और दृढ़ देहवाला हो जाता है ॥ ८६–६१ ॥ वक्तव्य—पहिले पारद गन्धक की कजली बनाकर उसमें गूगल आदि द्रव्य मिला लें, फिर मर्दन करने के लिये त्रिफलाक्वाथ ( गरम ) डालकर मर्दन करें जब गूगल के चिपकने से मर्दन करना कठिन हो जाय तो उसमें एरण्डतैल डालकर कूटना चाहिये । दशमो गन्धककल्पः फलत्रिकं भृङ्गराजो विमलश्च सुगन्धिकः । त्रयमेतत्समं ग्राह्यं श्लक्ष्णचूर्णं प्रकल्पयेत् ॥ ९२ ॥ दिव्यदृष्टिर्वज्रकायो मासेनेकेन जायते । षण्मासमात्रयोगाच्च वलीपलितनाशनः ॥ ९३ ॥ भा. टी.—त्रिफलाचूर्ण, भृंगराजचूर्ण और शुद्ध गन्धक; इन तीनों को समभाग लेकर एकत्र अच्छी तरह बारीक चूर्ण कर लें । इस चूर्ण को दो मासे मात्रा में एक मास तक प्रतिदिन प्रयोग करने से शरीर की वलि ( झुर्री ) तथा पलित ( बालों की सफेदी ) दूर हो जाता है ॥ ९२, ९३ ॥ अथ गन्धकतैलम् आवर्तमाने पयसि क्षिपेद्वै विशुद्धसौगन्धिकजं हि चूर्णम् । तदुद्भवक्षीरसमुत्थमाज्यं गन्धस्य तैलं वितरेत्प्रतप्तम् ॥ ९४ ॥