रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ रसतरङ्गिणी सुगन्धतैलं विनिहन्ति शीघ्रं क्षुद्राणि कुष्ठानि विशेषतो वै । हरेद्विसर्पादिकरोगसङ्घं विलेपनाद्वाऽशनतः प्रकामम् ॥ ९५ ॥ आवर्त्तमाने उत्कथ्यमाने। विलेपनाद् अशनतो वा इति सम्बन्धः ॥९४, ९५॥ उबलते हुए दूध में बारीक पीसा हुआ गन्धक का चूर्ण डाल दें और दूध को ठंडा करके मथकर मक्खन निकाल लें । अब इस मक्खन को खूब गरम करें तो घी के ऊपर गन्धकतैल आ जाता है । इसे हाथ से या रुई से अच्छी तरह निकाल लें । यह गन्धक तैल खाने और शरीर में लगाने से कुष्ठ विशेषतः क्षुद्रकुष्ठों और वीसर्प आदि त्वक् तथा रक्तदुष्टिजन्य रोगों को नष्ट करता है ॥ ९४-९५ ॥ गन्धकतैलस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः सप्तधा लेपयेदर्कदुग्धेन वै वस्त्रमच्छं पुनर्वज्रिदुग्धेन च । पेषयेद् गन्धकं मन्थजेन त्वथो वस्त्रमालेपयेत्तेन युक्त्या भिषक् ॥९६॥ गन्धलिप्तं पुनर्वस्त्रमापीडयन् वर्तिकाकारतामानयेत्कोविदः । दंशयन्त्रस्थितां निम्नपात्रोन्मुखीं ज्वालयेत् वर्तिकां युक्तितो वैद्यराट् ॥९७॥ हरेत्सुगन्धतैलन्तु पतितं काचभाजने । क्षुद्रकुष्ठादिरोगेषु मतिमान् सम्प्रयोजयेत् ॥ ९८ ॥ वज्रिदुग्धेन स्नुहीक्षीरेण मन्थजेन = नवनीतेन एतत्तैलस्य प्रयोग इति प्राञ्चः ॥ ९६-९८ ॥ भा. टी.—पहिले एक साफ कपड़े को सात बार आक के दूध और सात बार थोहर के दूध से लिप्त करके सुखा लें, अब इसके ऊपर मक्खन में पिसे हुए गन्धक का लेप कर दें । लेप करने के बाद इस कपड़े को एक तरफ से मोड़कर बत्ती बना लें । अब इस बत्ती को चिमटे से पकड़कर कुछ आगे से नीचे को झुकाते हुए पकड़े रहें और बत्ती के मुख के नीचे एक कटोरा रख बत्ती को जलायें । बत्ती के जलाने पर मक्खन के साथ गन्धक पिघलकर कटोरे में बिन्दु रूप से गिरेगा । यही गन्धक तैल है । इस तैल को क्षुद्र कुष्ठ आदि त्वक् रोगों में शरीर के ऊपर मलना चाहिये ॥ ९६-९८ ॥ गन्धकतैलस्य तृतीयो निर्माणप्रकारः कलांशत्र्यूषणोपेतं विमलं चूर्णितं बलिम् । विप्रकीर्योचितं वस्त्रे ततः सूत्रेण वेष्टयेद् ॥ ९९ ॥ यामं निमज्जयेत्तैले ततः संदंशयन्त्रगाम् । वर्तिं निम्नमुखीं कृत्वा काचपात्रमधो न्यसेत् ॥ १०० ॥