रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
१६२ रसतरङ्गिणी सुगन्धतैलं विनिहन्ति शीघ्रं क्षुद्राणि कुष्ठानि विशेषतो वै । हरेद्विसर्पादिकरोगसङ्घं विलेपनाद्वाऽशनतः प्रकामम् ॥ ९५ ॥ आवर्त्तमाने उत्कथ्यमाने। विलेपनाद् अशनतो वा इति सम्बन्धः ॥९४, ९५॥ उबलते हुए दूध में बारीक पीसा हुआ गन्धक का चूर्ण डाल दें और दूध को ठंडा करके मथकर मक्खन निकाल लें । अब इस मक्खन को खूब गरम करें तो घी के ऊपर गन्धकतैल आ जाता है । इसे हाथ से या रुई से अच्छी तरह निकाल लें । यह गन्धक तैल खाने और शरीर में लगाने से कुष्ठ विशेषतः क्षुद्रकुष्ठों और वीसर्प आदि त्वक् तथा रक्तदुष्टिजन्य रोगों को नष्ट करता है ॥ ९४-९५ ॥ गन्धकतैलस्य द्वितीयो निर्माणप्रकारः सप्तधा लेपयेदर्कदुग्धेन वै वस्त्रमच्छं पुनर्वज्रिदुग्धेन च । पेषयेद् गन्धकं मन्थजेन त्वथो वस्त्रमालेपयेत्तेन युक्त्या भिषक् ॥९६॥ गन्धलिप्तं पुनर्वस्त्रमापीडयन् वर्तिकाकारतामानयेत्कोविदः । दंशयन्त्रस्थितां निम्नपात्रोन्मुखीं ज्वालयेत् वर्तिकां युक्तितो वैद्यराट् ॥९७॥ हरेत्सुगन्धतैलन्तु पतितं काचभाजने । क्षुद्रकुष्ठादिरोगेषु मतिमान् सम्प्रयोजयेत् ॥ ९८ ॥ वज्रिदुग्धेन स्नुहीक्षीरेण मन्थजेन = नवनीतेन एतत्तैलस्य प्रयोग इति प्राञ्चः ॥ ९६-९८ ॥ भा. टी.—पहिले एक साफ कपड़े को सात बार आक के दूध और सात बार थोहर के दूध से लिप्त करके सुखा लें, अब इसके ऊपर मक्खन में पिसे हुए गन्धक का लेप कर दें । लेप करने के बाद इस कपड़े को एक तरफ से मोड़कर बत्ती बना लें । अब इस बत्ती को चिमटे से पकड़कर कुछ आगे से नीचे को झुकाते हुए पकड़े रहें और बत्ती के मुख के नीचे एक कटोरा रख बत्ती को जलायें । बत्ती के जलाने पर मक्खन के साथ गन्धक पिघलकर कटोरे में बिन्दु रूप से गिरेगा । यही गन्धक तैल है । इस तैल को क्षुद्र कुष्ठ आदि त्वक् रोगों में शरीर के ऊपर मलना चाहिये ॥ ९६-९८ ॥ गन्धकतैलस्य तृतीयो निर्माणप्रकारः कलांशत्र्यूषणोपेतं विमलं चूर्णितं बलिम् । विप्रकीर्योचितं वस्त्रे ततः सूत्रेण वेष्टयेद् ॥ ९९ ॥ यामं निमज्जयेत्तैले ततः संदंशयन्त्रगाम् । वर्तिं निम्नमुखीं कृत्वा काचपात्रमधो न्यसेत् ॥ १०० ॥
१३ अष्टमस्तरङ्गः १६३ ततः प्रज्वालयेदू युक्त्या गन्धो द्रवति बिन्दुशः । इदं सौगन्धिकं तैलं बुधैः श्रेष्ठतरं मतम् ॥ १०१ ॥ बिन्दुत्रयमितं तैलं ताम्बूलीदलसंस्थितम् । तत्समं विमलं सूतं संमद्यौथ प्रयोजयेत् ॥ १०२ ॥ दिनत्रयप्रयोगेण दीपयत्युदरानलम् । आमं निवारयत्येव दिनैकमपि योजितम् ॥ १०३ ॥ कासश्वासहरः कामं ग्रहणीगजकेशरी । आमवातादिरोगघ्नः स्नेहोऽयं गन्धसम्भवः ॥ १०४ ॥ कलाः षोडश । कलांशं षोडशांशम् । सूतसंमर्दनात्कज्जली भवति, ततः प्रयोज्यम् ॥ ९६-१०४ ॥ भा.टी.—गन्धकचूर्ण में सोलहवाँ भाग त्रिकटुचूर्ण मिला एक स्वच्छ कपड़े पर फैला दें और इसकी बत्ती बनाकर बत्ती को तागे से अच्छी तरह बांध दें। अब इस बत्ती को तीन घण्टे तक सरसों के तेल में भिगो दें, तीन घंटे के बाद निकाल चिमटे से एक तरफ पकड़ कर आगे को कुछ नीचे को झुकाकर इसके नीचे कांच का प्याला रख दें और बत्ती को जलाकर पकड़े रहें । इस प्रकार बत्ती जलाने से गन्धक पिघलकर बिन्दु-बिन्दु रूप से प्याले में गिरेगा। उसे गन्धकतैल कहते हैं । इस तैल में से तीन बूँद लेकर इसके बराबर भाग शुद्ध पारद को एकत्र खरल में पान के पत्तों के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन कर कज्जली-सी बना लें । इसके तीन दिन अन्तः प्रयोग करने से पाचकाग्नि तीव्र हो जाती है और पेट में सञ्चित आमदोष एक दिन में ही दूर होजाता है। यह तैल कासश्वासहर,ग्रहणीरोगनिवारक और आमवात आदि रोगनाशक है । ६६ गन्धकतैलस्य चतुर्थो निर्माणप्रकारः ब्रह्मबीजोद्भवं श्लक्ष्णचूर्णं क्षिपेच्छागदुग्धे ततः शोषयेद्युक्तितः । षोडशांशं बलिं तत्र सम्मेलयेत् काचकूप्यां ततो विन्यसेत्कोविदः ॥१०५॥ ततः पातालतन्त्रेण तैलं ग्राह्यं भिषग्वरैः । सत्त्वभूतं गन्धकस्य गन्धतैलं महोत्तमम् ॥ १०६ ॥ रक्तिद्वयं गन्धतैलं ताम्बूलोदलमध्यगम् । तैलाईं रसराजन्तु शुद्धं तत्र विमिश्रयेत् ॥ १०७ ॥ अङ्गुल्यग्रेण संमर्द्य कृत्वा कज्जलिकां चरेत् । ताम्बूल शीलयेत्पश्चाद् गन्धतैलस्य सेवकः ॥ १०८ ॥
१६४ रस्तरङ्गिणी ब्रह्मबीजं पलाशबीजम् । स्पष्टमन्यत् । योगोऽयमेव योगरत्नाकरे महाराज- वटीरसनाम्ना व्यवहृतः । सद्यः फलदश्चेति ॥ १०५–१०८ ॥ भा.टी.—ढाक के बीजों का बारीक चूर्ण करके इसको बकरी के दूध में मिलाकर तेज धूप में रखकर सुखा लें । अब इस दूध युक्त पलासबीज चूर्ण में सोलहवां भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर एक बोतल या कांच की शीशी में भर दें और इस शीशी को पूर्वोक्त विधि से पाताल यन्त्र में रखकर तेल निकाल लें । यह गन्धक तैल बहुत उत्तम गन्धक के सत्त्व सदृश होता है । दो रत्ती इस गन्धक तैल को पान के पत्ते में रख इसमें एक रत्ती रससिन्दूर मिला अंगुली से खूब रगड़ कर कज्जली बना लें और पान के साथ इस कज्जली का सेवन करें॥१०५-१०८॥ अत्रापथ्यम् अम्लं शाकादिकञ्चैव ककाराष्टकभेषजम् । उष्णवीर्यं यदन्यच्च तदपथ्यमिह संस्मृतम् ॥ १०६ ॥ योगेनानेन पुरुषो वृद्धोऽपि तरुणायते । अपूर्ववत् प्रतिदिनं रमयेद् रमणीशतम् ॥ ११० कासश्वासहरो बल्यो वलीपलितानाशनः । शोषसंशोषकः कामं क्षयकुञ्जरकेशरी ॥ १११ ॥ शूलकालानलः सत्यं मेहवर्गनिषूदनः । एतत्तैलसमं लोके नान्यदस्ति रसायनम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.—गन्धक सेवन करनेवाले मनुष्य को अम्ल द्रव्यों के शाक आदि तथा ककाराष्टक द्रव्य तथा और भी जो उष्णवीर्य द्रव्य हैं उनका त्याग करना चाहिये । इस गन्धकतैल योग का सेवन करने से वृद्ध मनुष्य भी तरुण की भाँति हो जाता है, प्रतिदिन सौ स्त्रियों के साथ नवीन रूप में मैथुन करने की शक्तिवाला हो जाता है । इसके अतिरिक्त इस योग के सेवन से कास-श्वास दूर होते हैं, शरीर में बल बढ़ता है और शरीर वली-पलित रहित हो जाता है । यह योग शोष को सुखानेवाला और क्षयरूप हाथी को सिंह की भांति नष्ट करता है । वातिक शूल, तथा सब प्रकार के प्रमेहों को नष्ट करता है । इस तैल के समान संसार में अन्य कोई रसायन नहीं कहा जाता है ॥ १०६–११२ ॥ अथ गन्धकद्रावकस्य निर्माणप्रकारः एकस्मिंल्लोहपात्रे तु बलिं शतपलोन्मितम् । निक्षिप्य चुल्लिकायाञ्च निधायाग्निं प्रदीपयेत्॥ ११३ ॥
अष्टमस्तरङ्गः १८५ अपरस्मिन् सोरकञ्च सार्द्धद्वितोलकोन्मितम् । निधाय चुल्ल्यामारोप्य वह्निं सन्धुक्षयेत्ततः ॥ ११४॥ पिधानेनानयोर्युक्त्वा भृशं संरोधयेन्मुखम् । नालिकाद्वितयं दीर्घं पात्रयोर्योजयेत् पृथक् ॥ ११५ ॥ कोष्ठागारेऽहिपात्रे च मुखं नलिकयोर्न्यसेत् । बलिसोरकयोरेवं धूमं सम्मिश्रयेद् बुधः ॥ ११६ ॥ दशाधिकद्विशतकपलं सलिलमाहरेत् । पात्रेऽन्यस्मिंश्च संस्थाप्य वह्नौ सन्तापयेत् भृशम् ॥ ११७॥ नालिकामुखतो बाष्पं नागपात्रेऽथ मेलयेत् । बाष्पसंयोगतश्चैव शतत्रयपलोन्मितः ॥ ११८ ॥ जायते गन्धकद्रावः पीताभोऽतिमनोहरः । अथ नव्यपरिभाषासम्मतो बलिद्रावः—एकस्मिन्निति । पात्रयोः वलिपात्रे सोरकपात्रे च । कोष्ठागारे इति कद्व्यागारे । अहिपात्रे सीसकनिर्मिते पात्रे । स्पष्टमन्यत् ॥११३-११८॥ भा.टी.—एक लोहे के पात्र में सौ पल शुद्ध गन्धक डालकर इसको चूल्हे पर रखकर अग्नि दें, इसी तरह एक दूसरे लोहपत्र में साढ़े छः पल सोरा डाल कर चूल्हे पर रख अग्नि दें । अग्नि पर रखने के पूर्व इन दोनों के मुखों को पृथक्-पृथक् अच्छी तरह बन्द कर दें और दोनों पात्रों के मुख पर छिद्र करके एक एक लम्बी नली फिट करके इन दोनों नलियों के मुखों को एक कुप्पी के आकार के सीसे के पात्र में जोड़ दें जिससे सोरक और गन्धकवाले पात्र से बाष्प उड़कर सीसे के पात्र में इकट्ठा हो जाय । अब एक अर्क निकालने वाले साफ भभके में दो सौ दस पल जल भरकर इसके मुख को भी बन्द कर एक नली लगाकर इस नली को भी उक्त सीसे के पात्र के मुख में जोड़ दें, इस तरह तीन नलियों का मुख एक पात्र में जोड़ने से बाष्प जमकर जल के रूप में पात्र के अन्दर तीन सौ पल परिमाण में इकट्ठा हो जायगा । यही सुन्दर पीताभ वर्ण का गन्धकद्राव कहा जाता है ॥११३-११८॥ गन्धकद्रावस्य नामानि गन्धद्रावो बलिद्रावो गन्धाम्लश्च स कीर्तितः ॥ ११९ ॥ भा.टी.—गन्धकद्राव को गन्धद्राव, बलिद्राव तथा गन्धकाम्ल (Sulphu- ric acid) कहा जाता है ॥११९॥
१६६ रसतरङ्गिणी विशुद्धो गन्धकद्रावः सुधाधिकफलप्रदः । अविशुद्धो दोषकारी तस्मात्तं शोधयेद् बुधः ॥ १२० ॥ भा. टी—शुद्ध गन्धकद्राव प्रयोग करने में अमृत के समान गुणकारी होता है, किन्तु अशुद्ध का प्रयोग अनेक हानिकारक होता है । अतः इसको शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिये ॥ १२० ॥ अथ गन्धकद्रावस्य शोधनप्रकारः गन्धकद्रावकं प्राज्ञः काचकुप्यां निधापयेत् । अस्यां संयोज्य नलिकां मुखमस्या नियोजयेत् ॥ १२१ ॥ अन्यस्यां काचकुप्यान्तु पचेन्मृद्वग्निना भिषक् । तस्य तृतीयमंशन्तु जलांशमधिकं भवेत् ॥ १२२ ॥ तस्मात्तं प्रथमं यत्नादस्मादपनयेद् भिषक् । विशुद्धं गन्धकद्रावं ततः कुप्यां निपातयेत् ॥ १२३ ॥ पात्रगं नागदोषं यज्जलांशमधिकञ्च यत् । गन्धद्रावो जहात्येवं निर्मलञ्च परं भवेत् ॥ १२४ ॥ अथास्यापि शोधनावश्यकतेति तच्छोधनप्रकारमाह । गन्धकद्रावमिति-अत्र बलिद्रावेऽधिकांशजलशोषः नागसंपर्कजन्यदोषलयश्च भवतीति । स्पष्टमन्यत् ॥ १२१-१२४ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त प्रकार से बनाये हुये गन्धकद्राव को एक कांच की बन्द मुखवाली शीशी में डालकर इसमें एक कांच की नली लगा दें और इस नली के दूसरे मुख को एक दूसरी रिक्त कांच की शीशी में जोड़कर नीचे मन्द-मन्द अग्नि (सुरादीप की अग्नि) जलायें । जब गन्धकद्राव वाली शीशी में से दो भाग जल स्रवित होकर दूसरी रिक्त शीशी में आ जाय तो अग्नि देना बन्द करके तृतीयांश जल भाग शीशी में ही छोड़ दें । इस प्रकार गन्धकद्राव में जो अधिक जल तथा सीसकदोष का अंश होता है वह सब दुबारा गन्धकद्राव को उड़ा लेने से नहीं रहने पाता है और गन्धकद्राव निर्मल हो जाता है ॥१२१-१२४॥ पानार्थे सजलगन्धकद्रावस्य निर्माणप्रकारः शीतांशभागकं शुद्धं गन्धकद्रावकं शुभम् । परिस्रुते तु सलिले रविभागमिते क्षिपेत् ॥ १२५ ॥ निधाय काचकुप्याञ्च विमलायां भिषग्वरः । दृढेनाथ पिधानेन रोधयेत् कूपिकामुखम् ॥ १२६ ॥
अष्टमस्तरङ्गः १६७ ततो निर्दिष्टरोगेषु मात्रयाऽप्रियत्नतः । गन्धद्रावं प्रयुञ्जीत रसतंत्रविशारदः ॥१२७॥ शीतांशुश्चन्द्रः स चैकस्तस्मादेकभागिकमित्यर्थः । रवयो द्वादशाख्याताः, ततश्च द्वादशभागमितम् । पिधानेनेति काचपिधानेन ॥ १२५-१२७ ॥ आ.टी.—एक भाग शुद्ध गन्धकद्राव को बारहभाग परिस्रुत (Distilled water ) जल में मिला एक स्वच्छ काँच की शीशी में भरकर अच्छी तरह डाट लगाकर रख लें। अब इसमें से भिन्न-भिन्न रोगों में मात्रा का विचार करते हुये सावधानी से प्रयोग करें ॥ १२५-१२७ ॥ सजलगन्धकद्रावस्य मात्रा आरभ्य शरबिंदुभ्यः खाक्षिविंदुमितं परम् । सजलं गन्धकद्रावं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥१२८॥ शरबिन्दवः पञ्चबिन्दवः । खाक्षिविन्दुः विंशतिबिन्दव इत्यर्थः ॥ १२८ ॥ भा.टी.—सजल गन्धक द्राव को पाँच बिन्दु से लेकर बीस बूँद तक निः- शंक प्रयोग कर सकते हैं ॥१२८ ॥ सजलगन्धकद्रावस्य सहपानम् पलं सार्द्धपलं वापि पलद्वयमितं जलम् । सनीरगन्धद्रावस्य सहपाने प्रयोजयेत् ॥१२६॥ यवान्याः शतपुष्पायास्त्वचो देवसुमस्य च । पृथक् परिस्रुतं तोयं सहपाने प्रदीयते ॥१३०॥ तोलकैकतः तोलकद्वयपर्य्यन्तं यवान्याद्यर्कस्य सहपानेन बलिद्रावस्य प्रयोगः कर्त्तव्यः । अर्केष्वपि पलार्द्धसम्मितं जलं मिश्रणीयम् । त्वक् गुडत्वक्, देवसुमस्य लवङ्गस्य ॥ १२६-१३० ॥ भा.टी.—सजलगन्धकद्राव में एक पल, डेढ़ पल, अथवा दो पल शुद्ध जल मिलाकर पीना चाहिये । इसके अतिरिक्त अजवाइन, सौंफ, दालचीनी अथवा लौंग इसमें से किसी एक अर्क के साथ सजलगन्धकद्राव पीना चाहिये ॥ १२६, १३० ॥ अथ गन्धकद्रावस्य गुणाः गुल्मप्लीहगजांकुशः कृमिहरः सर्वोदरातङ्कहृत् वीर्य्योष्णास्तु विसूचिकामयहरः सङ्कोचको निर्भरम् । आध्मानज्वरवेगरोधनपटू रक्तातिसारान्तकः रक्तस्रावहरोऽग्निदीप्तिजननो गन्धोद्भवो द्रावकः ॥१३१॥
१६८ रसतरङ्गिणी तृषां विसूचिकोद्भूवां हरत्ययं विशेषतः । तथातिघर्मरोधकः सदातिसारनाशनः ॥१३२॥ विकारान् दारुणान् नित्यं दुष्टनागाशनोत्थितान् । नाशयत्यचिरादेव तिमिरन्तु यथा रविः ॥१३३॥ निर्भरं अत्यर्थम् । सङ्कोचः मलस्तम्भक इत्यर्थः । अतिघर्मरोधकः प्रभू- तस्वेदहन्ता । सदा इति नियमेनेत्यर्थः । सङ्कोचकत्वादिति यावत् । दुष्टनागा- शनम् अशुद्धामृतसीसकभक्षणं तदुत्थान् पक्षवधादीन् ॥ १३१-१३३ ॥ इति गन्धकविज्ञानीयो नाम अष्टमस्तरङ्गः भा.टी.—गन्धकद्राव गुल्म और प्लीहारूपी हाथी के लिये अंकुश है । क्रिमिनाशक, सब उदर रोगों को नष्ट करनेवाला, उष्णवीर्य, विसूचिकारोग- नाशक, स्थानीयसंकोचक, मलस्तम्भक है । आध्मान युक्त ज्वरवेग को रोकने- वाला, रक्तातिसार में लाभदायक, तथा शरीर में से होनेवाले रक्तस्राव को बन्द करनेवाला है । इसके प्रयोग से अग्नि बढ़ती है । हैजे की प्यास को रोकने में यह विशेष रूप से लाभदायक है । इसके देने से रोग की अवस्था में अधिक निलकनेवाला पसीना रुक जाता है । अतीसार के लिये सदा उपयोगी है । इसके अतिरिक्त अशुद्ध नाग ( सीसा ) के सेवन से होनेवाले भयंकर विकारों को यह शीघ्र मिटाता है ॥ १३१-१३३ ॥ यह गन्धकविज्ञानीय नाम अष्टमतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ हिङ्गुलविज्ञानीयो नवमस्तरङ्गः हिङ्गुलस्य नामानि हिङ्गलो हिङ्गुलश्चैव हिङ्गुलं चेङ्गुलाह्वयम् । म्लेच्छं रक्तं सुरङ्गञ्च चित्राङ्गं चूर्णपारदम् ॥१॥ रसोद्भवो रसस्थानं रञ्जनं कपिशीर्षकम् । रक्तकायो हंसपादो दरदञ्च प्रकीर्तितम् ॥२॥ पर्यायभेदविवरणं शास्त्रे व्यवहारार्थम् ॥१-२॥ भा.टी.—हिंगल, हिंगुल, हिंगूल, इंगुल, म्लेच्छ, रक्त, सुरंग, चित्रांग, चूर्णपारद, रसोद्भव, रसस्थान, रञ्जन, कपिशीर्षक, रक्तकाय, हंसपाद और दरद, ये सब सिंगरफ के नाम या पर्यायवाचक शब्द हैं ॥ १-२ ॥
नवमस्तरङ्गः १६६ हिंगुलस्य स्वरूपम् जपाकुसुमवर्णाभः पेषणे सुमनोहरः । महोज्ज्वलो भारपूर्णो हिंगुलः श्रेष्ठ इष्यते ॥३॥ भा.टी.—उत्तम हिंगुल गुड़हल के पुष्प सदृश वर्ण का, पीसने में कोमल देखने में चमकीला लाल और भारयुक्त होता है ॥ ३ ॥ हिंगुलस्य द्वौ भेदौ प्रथमः खनिजोऽन्यस्तु कृत्रिमो हिंगुलो मतः । खनिजः खनितो जातः कृत्रिमो रसगन्धजः ॥४॥ खनिजःकृत्रिमश्चेति हिंगुलस्य द्वौ भेदौ। प्राञ्चस्तु—"दरदस्त्रिविधः प्रोक्त- श्चर्मारः शुकतुण्डकः । हंसपादस्तृतीयः स्याद् गुणवानुत्तरोत्तरः ॥” इत्याहुः । आचार्यैस्तु यथोपलब्धिव्यवस्थानमाचरितमिति विशेषः । वस्तुतस्तु—"चर्मारः शुकवर्णः स्यात् सपीतः शुकतुण्डकः। जपाकुसुमसंकाशो हंसपादो महोत्तमः ॥” इत्यनुविधानात् खनिजस्यैव विधात्रयमित्याहुः । कृत्रिमस्तु कठिनमसृणभेदा- द्विद्यते इति निर्माणप्रकारे वक्ष्यते ॥ ४ ॥ भा.टी.—हिंगुल के दो भेद होते हैं १—खनिज हिंगुल, २—कृत्रिम (बनावटी) हिंगुल । इसमें से खनिज हिंगुल खानों से प्राप्त होता है, किन्तु कृत्रिम पारदगन्धक से मृदंगयन्त्र द्वारा बनाया जाता है ॥ ४ ॥ वक्तव्य—प्राचीन रसशास्त्र मे हिंगुल के चर्मार, शुकतुण्डक तथा हंसपाद ये तीन भेद पाये जाते हैं । ये तीन भेद खनिज के समझने चाहिये । परन्तु यहाँ पर साधारणरूप से प्राप्त होनेवाले जपाकुसुमवर्ण हिंगुल का ही वर्णन किया गया है ॥ कृत्रिमहिंगुलस्य निर्माणप्रकारः वसुभागमितं गन्धं सूतं नेत्रयुगोन्मितम् । मृदङ्गयन्त्रे संस्थाप्य वारंगं भ्रामयेत्ततः ॥५॥ तस्य सम्भ्रमणादेव श्लक्ष्णचूर्णं प्रजायते । व्यावर्त्तनपिधानञ्च सम्भ्राम्य ह्यवतारयेत् ॥६॥ चूर्णं धूसरवर्णाभं यन्त्रान्निष्कासयेत्ततः । सुदृढायां ततः स्थाल्यां चूर्णमेतन्निधापयेत् ॥७॥ रेखान्वितमुखी स्थाली बुधैरत्र प्रशस्यते । व्यावर्तनमुखीमन्यां स्थालीं तस्यां निधापयेत् ॥८॥
२०० रसतरङ्गिणी स्थालीं सम्भ्राम्य परितो यत्नेन रोधयेन्मुखम् । ततः संस्थापयेच्चुल्यां वह्निं दद्याच्छनैः शनैः ॥६॥ अधःस्थालीकण्ठसंस्थं हिंगुलं तु समाहरेत् । ऊर्ध्वस्थालीतलस्थञ्च पुनः पक्त्वा समाहरेत् ॥१०॥ कृत्रिमहिंगुलनिर्माणप्रकारः—गन्धकस्याष्टौ भागाः, पारदस्य द्विचत्वारिंशद् भागाः, मृदङ्गयन्त्रं प्रागुक्तम् । वारङ्गं हस्तकम् । अधःस्थालीकण्ठलग्नं गन्धक- स्याल्पत्वात् मृदुतरम् । ऊर्ध्वस्थालीतलस्थं तु गन्धकस्य प्राचुर्य्यात्कठिनतरम् । तस्मात्तस्य पुनः पाकावश्यकता अवशिष्टगन्धकजारणद्वारा मार्दवसम्पादनाय । सोऽयं हिंगुलनिर्माणप्रकारः साम्प्रतं प्रचलितः । प्राञ्चस्तु वालुयन्त्रद्वारा हिंगुलनिर्माणमाहुः तत्तु बहुलायाससाध्यत्वात् दुष्करमिति स प्रकार उपेक्षित आचार्यैः ॥ ५–१० ॥ आ.टी.—आठ भाग गन्धक और बयालीस (४२) भाग पारद लेकर इसको पूर्वोक्त मृदंगयंत्र डालकर इसके वारंग (Handle) को घुमा दें । इसके घूमने से दबाव पड़ने के कारण पारद गन्धक का चमकीला बारीक चूर्ण हो जायगा । तब ढक्कन को घुमाकर अलग करके यन्त्र में से धूसरवर्णभ चूर्ण को निकाल करके उसे एक ऐसी स्थाली (पात्र) में रखें जिसके मुख पर बाहर की तरफ से गोल रेखायें (ढक्कन फिट करने के लिये चूड़ियाँ) बनी हों । अब इस स्थाली के मुख में एक दूसरी स्थाली, जिसके मुख पर भी रेखायें बनी हों, औंधी मुख जोड़कर (घुमाकर फिट करके सन्धिस्थल को अच्छी तरह) बन्द कर दें । अब इस यन्त्रको चूल्हे पर रखकर धीरे-धीरे अग्नि जलायें । अग्नि शान्त होने पर स्वांगशीत यन्त्र को खोलकर नीचे की स्थाली के कण्ठप्रदेश में लगे हुये कोमल हिंगुल को निकालें । और ऊपर की स्थाली के तल में जमे हुये कठोर हिंगुल को कोमल करने के लिये पुनः उसी प्रकार से पकाकर कोमल बना निकाल लें ॥ ५–१० ॥ अशुद्धहिंगुलस्य दोषाः अशुद्धो हिंगुलो मोहं प्रमेहं चित्तविभ्रमम् । आन्ध्यं क्लमं तथा क्लैब्यं कुर्य्यात्तस्माद्विशोधयेत् ॥११॥ अथाशुद्धहिंगुलदोषाः—मोहं धीविभ्रमम् । चित्तविभ्रमं तमस उद्रेकात् भ्रान्तिम् । क्लमः अनायासजातः श्रमो देहेन्द्रियम्लानताहेतुः । क्लैब्यं दुर्बल- तामिति यावत् । तस्मात् उक्तव्याधिहेतुत्वादित्यर्थः ॥ ११ ॥
नवमस्तरङ्गः २०१ भा.टी.-अशुद्धहिंगुल सेवन करने से बुद्धिभ्रम, प्रमेह रोग, चित्तविभ्रम, आँखों के सामने अँधेरा आना, बिना श्रम के थकावट अनुभव होना और शरीर में दुर्बलता रूप विकार हो जाते हैं, अतः हिंगुल को शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिये ॥ ११ ॥ अथ हिंगुलशोधनस्य प्रथमः प्रकारः हिंगुलं चूर्णितं खल्वे शृंगवेराम्भसा ततः । सप्तधा भावयेत्प्राज्ञो निर्मलो हिंगुलो भवेत् ॥१२॥ शृङ्गवेरं आर्द्रकम् तत्तद्रसभावनाय च संयोगजविजातीयगुणान्तरोत्पत्त्या पूर्वदोषप्रध्वंसः । स चानुभवसाध्य इति प्राञ्चः । औषधबलाबलापेक्षया च एकधाऽनेकधा वा भावना ॥ १२ ॥ भा.टी.-हिंगुल को खरल में डालकर पीसें और इसको अदरक के रस की सात भावना देकर सुखा लें तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥ वक्तव्य-अदरखरस या नीबूरस आदि से हिंगुल को भावना देकर अंत में उसमें जल भर दें, जब जल मात्र ऊपर आ जाय तो उस जल को अलग कर दें, नीचे के हिंगुल को सुखाकर काम लावें । जल से बिना धोये ही काम में लाने से दोषों का निर्हरण अच्छी तरह नहीं होता । द्वितीयः शोधनप्रकारः हिंगुलं चूर्णितं खल्वे लकुचस्याम्भसा ततः । विभाव्य शोषयेद् वैद्यो हिंगुलः शुद्धिमाप्नुयात् ॥१३॥ लकुचस्याम्भसाऽपि सप्तधा भावना विधेया ॥ १३ ॥ भा.टी.-हिंगुल को खरल में चूर्ण करके बड़हड़ के जल से सात भावना देकर सुखा लेने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः सुचूर्णितं हिंगुलन्तु मेषीदुग्धेन भावयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धमायात्यनुत्तमाम् ॥१४॥ अम्लवर्गोक्तभैषज्यैर्भावितः सप्तधा पुनः । हिंगुलः परमां शुद्धिमाप्नोतीति किमद्भुतम् ॥१५॥ मेषीदुग्धभावितस्य पुनरम्लवर्गभावनया गुणवृद्धिश्च भवतीति । तदेतदाहुः- “मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चि- तम् ॥” इति ॥ १४-१५ ॥
२०२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—हिंगुल को चूर्ण करके भेड़ के दूध की सात भावना देने से वह शुद्ध हो जाता है। फिर इस मेषीदुग्धभावित हिंगुल को अम्लवर्गोक्त औषधियों के रस से सात भावना देकर सुखा लिया जाय तो यह उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १४-१५ ॥ वक्तव्य—भेड़ के दूध में मर्दन करने से हिंगुल में घी का स्नेहांश रह जाता है। इसी को मिटाने के लिये पुनः हिंगुल को अम्लवर्ग से भावना दी जाती है। चतुर्थः शोधनप्रकारः निम्बूकरससेनेह हिङ्गुलं श्लक्ष्णचूर्णितम् । विभावयेत्सप्तवारं क्षालयेद्बहुशोऽम्भसा ॥ १६ ॥ ततः संशोषयेद् घर्मे रसतन्त्रविधानवित् । एवं विशोधितं रक्तं वीतशङ्क प्रयोजयेत् ॥ १७ ॥ चतुर्थे शोधनप्रकारे निम्बूकरससेन पेषणाद् दरदस्थः स्वतन्त्रः पारदो विश्लिष्टो भवत्यातपे शोषणाच्चोड्डीयत इति सोऽयं प्रकारः साधीयान् सिद्धः । स्पष्टमन्यत् ॥ १६-१७ ॥ भा.टी.—हिंगुलचूर्ण को खरल में डालकर नीबूरस के साथ मर्दन करते हुए सात भावना दें। फिर अन्त में इसको जल से अच्छी तरह अम्ल अंश निकलने तक धोकर धूप में सुखा लें। इस प्रकार शुद्ध हिंगुल को निःसंकोच योगों में काम में ला सकते हैं ॥ १६-१७॥ शोधितहिंगुलस्य गुणाः लोचनामयहरः कफापहः पित्तजामयनिषूदनः परम् । प्लीहकुष्ठगरकामलाहरो जाठराग्निजननोऽथ पाचनः ॥ १८ ॥ मेहवर्गपरितापनाशनो देहकान्तिबलवुद्धिवर्द्धनः । आमवातगजदर्पखण्डनो हिंगुलो विजयते ज्वरापहः ॥ १९ ॥ शोधितहिङ्गुलस्य गुणाः—लोचनामयाः नेत्ररोगाः। पित्तजामयाः दाहा- दयः। गरं कृत्रिमविषम् । मेहवर्गपरितापनाशन इति प्रमेहसमूहजनितदुःखवि- नाशी ॥ १८-१९ ॥ भा.टी.—शुद्ध हिंगुल नेत्ररोगहर, कफप्रकोपनाशक, पित्तप्रकोपजन्य-रोग- हर है। यह विभिन्न औषधियोग से प्लीहा, कुष्ठ, गरविष तथा कामला रोगों को नष्ट करता है। यह पाचक, अग्निवर्धक तथा आमपाचन करता है। सम्पूर्ण प्रमेहों को नष्ट करता है। शरीर में कान्ति, बल-बुद्धि को बढ़ाता है। आमवात के प्रकोप को दूर करता है और ज्वरनाशक है ॥ १८-१९ ॥
नवमस्तरङ्गः २०३ शुद्धहिंगुलस्य प्रयोगाः बलिजातीफलाऽफूककणाविश्वसमन्वितम् । दरदं विनिहन्त्याशु वातं शुक्रसमाश्रितम् ॥२०॥ पिप्पलीविषसंयुक्तं दरदं परिशीलितम् । मध्वार्द्रकरसेनेह हन्ति वातज्वरं द्रुतम् ॥२१॥ भयोत्थितं ज्वरं वापि पित्तश्लेष्मोद्भवं ज्वरम् । नवज्वरायमाणं च त्वामवातोद्भवं ज्वरम् ॥२२॥ जातीफलाऽफूकमुस्तचन्द्रैन्द्रयवसंयुक्तम् । दरदं शीलितं हन्ति ह्यामातीसारमुल्बणम् ॥२३॥ जातीफललवङ्गेन्द्रयवटङ्गेन्दुसंयुक्तम् । दरदं विनिहन्त्याश रुजमामातिसारजाम् ॥२४॥ अथास्य रोगयोग्याः प्रयोगाः—बलिः गन्धः, आफूकम् अहिफेनम्, कणा पिप्पली, विश्वं शुण्ठी, चन्द्रः कर्पूरम् । आमातिसारे पाचनौषधैः आमं सम्पाच्य पश्चात् जातीफलाफूकादियोगस्य प्रयोगः कार्यः ॥२०–२४॥ भा.टी.—शुद्ध गन्धक, जायफल, शुद्ध अफीम, पिप्पलीचूर्ण और शुण्ठीचूर्ण के साथ शुद्ध हिंगुल मिलाकर प्रयोग करने से शुक्रगत वातप्रकोप शान्त होता है । वातज्वर में हिंगुल को पिप्पलीचूर्ण और शुद्ध वत्सनाभचूर्ण के साथ मिला मधु और अदरखरस के साथ सेवन करना चाहिये । इसी प्रकार से इसको भय- जन्यज्वर, पित्तश्लेष्मज्वर, आमवातिकज्वर में तथा तरुण नवीन ज्वर में भी प्रयोग किया जाता है । भयंकर अतीसार में इसको जायफल, अफीम, इन्द्रजौ, मोथा और कर्पूर मिलाकर प्रयोग किया जाता है । आम-अतीसार में हिंगुल को जायफल, लौंग, इन्द्रजौ, सुहागाग्नील और कर्पूर के साथ मिलाकर प्रयोग करना चाहिये ॥ २०–२४ ॥ हिङ्गुलाद्यमलहरः सिक्थतैलं सुविमलं भानुत्तोलकसंमितम् । सिन्दूरं दरदञ्चैव तोलकार्द्धमितं क्षिपेत् ॥२५॥ विमद्ये मसृणे खल्वे काचकुप्यां तु विन्यसेत् । हिङ्गुलाद्यो मलहरः फिरङ्गव्रणरोपणः ॥२६। भा.टी —स्वच्छ सिक्थतैल बारह तोला, सिन्दूर और हिंगुल आधा-आधातोला लेकर सबको खरल में अच्छी तरह मिलाकर कांच की शीशी में रख लें । इसको हिंगुलमलहर कहते हैं । यह फिरंग-व्रणों को भरने के काम आता है॥२५–२६॥
२०४ रसतरङ्गिणी हिङ्गुलामृतमलहरः सिक्थतैलं सुविमलं सूयेतोलकसंमितम् । तोलकार्द्धमितं चैव दरदं सुविचूर्णितम् ॥२७॥ मृद्दारशृङ्गं सौभाग्यं कर्पूरं रसपुष्पकम् । स्फटिका गिरिसिन्दूरं पृथग् माषद्वयोन्मितम् ॥२८॥ सम्मेल्य मसृणे खल्वे काचकुप्यां तु विन्यसेत् । मतो मलहरोऽयं तु हिङ्गुलामृतसंज्ञकः ॥२९॥ हिङ्गुलामृतसंज्ञोऽयं पूयनिर्हरणाः परम् । शोधनो रोपणश्चैव विविधव्रणरोपणः ॥३०॥ व्रणपूरणयोगेन नाडीव्रणनिषूदनः । भगन्दरहरश्चापि समाख्यातो विशेषतः ॥३१॥ हिंगुलाद्ये हिंगुलामृताख्ये च मलहरे सिक्थतैलं द्वादशतोलकम् । स्पष्टम- न्यत् ॥ २७-३१ ॥ भा.टी.—स्वच्छ सिक्थतैल बारह तोला, हिंगुलचूर्ण छे' मासे, मुरदासंग, सुहागा, कपूर, रसकपूर, फिटकरी और सिन्दूर; प्रत्येक दो-दो मासा लेकर सबको खरल में मिला कांच की शीशी में रख लें । इसे हिंगुलामृत-मलहर कहते हैं । यह मरहम व्रण में से पूय निकालने में उत्तम है । व्रणों का शोधन और रोपण करता है । यह मरहम व्रण को भरनेवाला है । अतः यह नारीव्रण तथा भग, न्दरव्रण के लिये विशेष लाभदायक है ॥२७-३१॥ अथ हिङ्गुलाद्रससिन्दूरस्य निर्माणप्रकारः निम्बूद्रवसंशुद्धं क्षालितञ्चाथ वारिणा । पलोन्मितं तु दरदं शुद्धं गन्धञ्च तत्समम् ॥३२॥ श्लक्ष्णचूर्णं ततः कृत्वा काचकुप्यां निधापयेत् । रससिन्दूरविधिना वालुकायन्त्रगं पचेत् ॥३३॥ स्वांगशीतं ततो ज्ञात्वा जपाकुसमसमप्रभम् । आहरेद्रससिन्दूरं रसागमविशारदः ॥३४॥ अस्य गुणादिनिरूपणम् गुणा मात्राप्रभेदश्च प्रयोगश्चांनुपानकम् । पथ्यापथ्यादिकञ्चापि रससिन्दूरवन्मतम् ॥३५॥ हिङ्गुलाद्रससिन्दूरनिर्माणप्रकारः-निम्बूकरसशुद्धस्य जलक्षालितस्य च दरदस्य
ग्रहणामुज्ज्वलवर्णत्वात् निःस्नेहत्वात् निर्मलत्वाचौषधयोग्यताहेतुत्वात् सर्वमन्य- त्समानं रससिन्दूरेण ॥ ३२-३५ ॥ भा.टी.—नींबू के रस से शुद्ध कर जल से साफ किया हुआ हिंगुल एक पल और शुद्ध गन्धक एक पल लेकर दोनों को अच्छी तरह पीसकर कपड़मिट्टी की हुई कांच की बोतल में भरकर बालुकायन्त्र में रखकर रससिन्दूरविधि के अनुसार पका लें । स्वांगशीत होने पर शीशी के गल-प्रदेश में लगे हुए गुड़- हलपुष्पवर्ण रससिन्दूर को निकाल लें । इस हिंगुल-निर्मित रससिन्दूर के गुण, मात्रा, आमयिक प्रयोग, अनुपान तथा पथ्य आदि सब रससिन्दूर के समान ही समझने चाहिये ॥ ३२-३५ ॥ श्रीसिद्धदरदामृतः कर्षद्वयमितं खण्डं हिंगुलस्य समाहरेत् । भृशं कार्पाससूत्रेण वेष्टयेत्परितो भिषक् ॥ ३६ ॥ निधापयेदम्बरीषे चुल्लिकाधिष्ठिते ततः । पलद्वयोन्मितं तत्र पलाण्डुस्वरसं क्षिपेत् ॥ ३७ ॥ कर्षैकञ्च वटक्षीरं ततोऽग्निं दीपयेद् भृशम् । शुष्के जलांशे चुल्लीतोऽम्बरीषमवतारयेत् ॥ ३८ ॥ स्वांगशीतं ततो ज्ञात्वा रक्तखण्डं समाहरेत् अम्बरीषं प्रमृज्याथ चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ ३६ ॥ कर्षोन्मितं देवपुष्पचूर्णं तत्र प्रसारयेत् । ततो दरदखण्डञ्च निदध्याद् युक्तितो भिषक् ॥ ४० ॥ भल्लातकफलानाञ्च सार्द्धद्वादशकर्षकम् । स्तूपाकारतया तस्मिन् निदध्यात्परितो भिषक् ॥ ४१ ॥ देवपुष्पस्य चूर्णान छिद्रान्यत्र प्रपूरयेत् । ततः प्रज्वालयेद्वह्निं रसतन्त्रविशारदः ॥ ४२ ॥ दग्धान् भल्लातकान् प्राज्ञो मध्यतश्चापसारयेत् । घृतं दशगुणं रक्तात् क्रमशो निक्षिपेत्ततः ॥ ४३ ॥ दग्धं चापि घृतं प्राज्ञो हिंगुलं त्ववतारयेत् । कार्पाससूत्रभस्माथ संमृज्यापनयेद्भिषक् ॥ ४४ ॥ समर्पितो हि सिद्धेभ्यो यतोऽयं त्रिपुरद्विषा । भुवनेऽसौ ततः ख्यातः श्रीसिद्धदरदामृतः ॥ ४५ ॥
२०६ रसतरङ्गिणी अथ श्रीसिद्धदरदामृतः—कर्षद्वयमितं चतुस्तोलकम् । एकमेवैतादृशं खण्डं ग्राह्यं पाकयोग्यत्वात् न चूर्णितम् । अम्बरीषं घटादिखर्परं पक्वकपालं क्षुद्रकटाहं वा । उपर्युपरिचयनं स्तूपाकारतया । देवपुष्पं लवङ्गम् । दह्यमानेषु भल्लातकेषु साधकस्तत्र न तिष्ठेदेकत्र भल्लातकधूमस्पर्शान्मुखादिशोथाशंका । ऊरुस्तम्भपञ्च- वधसन्निपातशीतांगसन्निपातेषु भल्लस्य द्विशततमोऽशः रक्तिकायां मात्रायामेकस्यां सम्मिश्र्य गव्यपयोऽनुपानेन दातव्यः, आमवाते पुराणेन गुडेन सह । पयोऽनु- पानेन क्लैब्ये ताम्बूलदलादिभिः सह विविच्य स्पष्टमन्यत् ॥ ३६-४५ ॥ भा.टी.—चार तोले की एक शुद्ध हिंगुल की डली लेकर उसको चारों तरफ से तागे से खूब अच्छी तरह लपेट लें । अब इसको एक छोटी सी कड़ाही अथवा मिट्टी के कड़ाही सदृश पात्र में रखकर चूल्हे पर रख दें । और कड़ाही में दो पल परिमाण प्याज का स्वरस और एक कर्ष परिमाण बड़ का दूध डाल कर चूल्हे में अग्नि जलायें । जब जलीयांश सूख जाय तो कड़ाही को नीचे उतार ठण्डा होने पर सिंगरफ के टुकड़े को निकाल कर फिर उस कड़ाही को अच्छी तरह साफ करके चूल्हे पर चढ़ा दें और इसमें दो तोले लौंग का चूर्ण डालकर इसके ऊपर अच्छी तरह से सिंगरफ के टुकड़े को टिका दें। फिर इसके ऊपर पच्चीस तोले भिलावा फलों को इस तरह रखें जिससे ऊपर को पतला नोकदार और नीचे को चौड़ा आकार ( जैसा बाजार में टोकरियों पर लगाया हुआ आटा होता है ) बन जाय । अब भल्लातकफलों के बीच के छिद्रों को लौंग के चूर्ण से अच्छी तरह बन्द कर दें और जलाकर पकायें । जब भिलावे जल जायँ तब इनको बीच में से हटाकर इनमें हिंगुल से दशगुणा अधिक घृत थोड़ा-थोड़ा करके डालते हुये इसे भी जला लें । अब कड़ाही को नीचे उतार ठण्डा करके सिंगरफ को तागों से पृथक् करके अच्छी तरह पोंछकर खरल में पीस लें । इस योग को पहिले शिवजी ने सिद्ध लोगों को दिया था । अतः यह योग संसार में सिद्धदरदामृत नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ३६-४५ ॥ अथास्य गुणाः ऊरुस्तम्भं त्वामवातं तथा पञ्चवधाह्वयम् । शीताङ्गसंज्ञकञ्चापि सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ४६ ॥ प्लीहोदरं दीर्घकालजातं दोषत्रयोत्थितम् । क्लैब्यञ्च नाशयत्याशु श्रीसिद्धदरदामृतः ॥ ४७ ॥
नवमस्तरङ्गः २०७ वैशिष्ट्यादनुपानानां करोति विविधान् गुणान् । मात्रयोचितया दत्तो रोगसंघञ्च नाशयेत् ॥ ४८ ॥ भा.टी.—यह दरदामृत योग, ऊरुस्तम्भ, आमवात, पक्षाघात में विशेष लाभदायक है। शीतांग-सन्निपात में यह विशेष लाभदायक माना जाता है। इसके अतिरिक्त पुरानी सान्निपातिक प्लीहावृद्धि तथा भयंकर नपुंसकता को यह शीघ्र ही दूर करता है। विशेष-विशेष अनुपानों के साथ प्रयोग करने पर यह अनेक गुणदायक औषधि है। यदि उचित मात्रा में देश-काल आदि का विचार से प्रयोग किया जाय तो अनेक रोगों को दूर करता है ॥ ४६-४८ ॥ अस्य मात्रा गुञ्जार्धसंमिता त्वस्य पूर्णमात्रा प्रशस्यते । बलकालादिकं वीक्ष्य ह्रासयेच्चाथ वर्द्धयेत् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—दरदामृत की मात्रा आधी रत्ती की पूर्ण मात्रा समझनी चाहिये । रोगी के बल और काल आदि को देखकर मात्रा में अधिकता या न्यूनता भी की जा सकती है ॥ ४६ ॥ हिंगुलीयो माणिक्यरसः विशोधितं हिंगुलञ्च तोलकाष्टकसंमितम् । सौगन्धिकञ्च तत्तुल्यं तथा शैलूषभूषणम् ॥ ५० ॥ पलाशपुष्पस्वरसैः पेषयेद्दिनसप्तकम् । शोषयित्वा रसञ्चाथ विदध्यात् श्लक्ष्णचूर्णकम् ॥ ५१ ॥ काचकूप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रमध्यगम् । क्रमवृद्ध्यानलेनात्र पचेद् वै दिवसत्रयम् ॥ ५२ ॥ स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा कूपिकाकण्ठसंस्थितम् । रससिन्दूरसंकाशं माणिक्यरसमाहरेत् ॥ ५३ ॥ हिंगुलीयो माणिक्यरसः—शुद्ध हिंगुलं ८ तो०, गन्धकं ८ तो०, हरिताल ८ तो०, माणिक्यमिति कान्तिमत्तया संज्ञा ॥ ५०-५३ ॥ भा.टी.—शुद्धहिंगुल आठ तोला, शुद्ध गन्धक तथा हरिताल आठ-आठ तोला लेकर इनको खरल में एकत्र करके ढाक के फूलों के स्वरस के साथ सात दिन तक मर्दन करके अच्छी तरह सुखाकर बारीक चूर्ण करके कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भरकर वालुकायन्त्र में रख के मन्द, मध्य तथा तीव्र अग्नि से तीन दिन तक पकावें । जब वालुकायन्त्र स्वांगशीतल हो जाय तो कूपी के प्रदेश में लगे हुये रससिन्दूर के सदृश वर्ण के माणिक्य रस को निकल लें ॥ ५०-५३ ॥
२०८ रसतरङ्गिणी हिंगुलीयमाणिक्यरसस्य गुणाः ग्रहणीगदवारणदर्पहरस्त्वतिसारनिवारणदक्षतरः । रुधिरोत्थितरोगविनाशकरो बलवीर्यशरीरसमुद्धिकरः ॥५४॥ क्षुद्रकुष्ठहरः कामं वयःस्थापनकारकः । माणिक्यरससंज्ञोऽयं सर्वामयहरो मतः ॥ ५५ ॥ वारणो हस्ती, रुधिरोत्थितरोगाः पिडकादयः । मात्राल्पत्वं हरितालसत्त्व- संयोगात् । स्पष्टमन्यत् ॥ ५४-५५ ॥ आ.टी.--यह माणिक्यरस ग्रहणी रोगरूपी हाथी के अभिमान (घमंड) को चूर करनेवाला और पुरातन अतीसार को नष्ट करने में अत्यन्त सफल है। रक्त- विकृतिजन्य रोगों को नष्ट करता है । बल-वीर्य और शरीर की वृद्धि करता है । क्षुद्र कुष्ठों (त्वग्रोग) को नष्ट करता है । शीघ्र आनेवाले बुढ़ापे को रोकता है । इस प्रकार यह माणिक्यरस सब रोगों को नष्ट करता है ॥ ५४-५५ ॥ अस्य मात्रा यवैकतः समारभ्य यवत्रितयसंमितम् । युञ्जीत रसमाणिक्यं बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५६ ॥ भा.टी.-माणिक्यरस की मात्रा रोग तथा रोगी के बल काल आदि के अनुसार एक जौ से लेकर तीन जौ तक प्रयोग की जा सकती है ॥ ५६ ॥ श्रीसिद्धहिंगुलेश्वरः विशोधितं हिंगुलञ्च धत्तूरमूलजद्रवैः । विभावयेत्सप्तवारं ततः संशोषयेद् बुधः ॥ ५७ ॥ तत्तुल्यं टङ्कणं क्षिप्त्वा श्लक्ष्णचूर्णं प्रकल्पयेत् । रसज्ञैः कीर्तितो नाम्ना श्रीसिद्धहिंगुलेश्वरः ॥ ५८ ॥ विश्वमोचरसोपेतं पुरूहूतयवान्वितम् । गुञ्जार्द्धप्रमितं दद्याद्रसतन्त्रविशारदः ॥ ५६ ॥ ततोऽनुपाययेच्छीघ्रं धान्यशीतकषायकम् । दाहमूर्च्छापिपासादीन् नाशयेद्वै ह्युपद्रवान् ॥ ६० ॥ पाचनो दीपनश्चायं नाडीगतिनियामकः । ज्वरघ्नः कृमिसंहारी कफघ्नो मृदुधारकः ॥ ६१ ॥ कोष्ठवातप्रशमनो भृशं वातानुलोमनः । नैतत्समो रसो लोके ज्वरातीसारनाशनः ॥ ६२ ॥
१४ नवमस्तरङ्गः २०६ श्रीसिद्धहिंगुलेश्वरः—धत्तूरमूलरसैः सप्तवारं सम्यग्भावनं दरदस्य विशेष- गुणाधानकरम् । विश्वं शुण्ठी, पुरुहूतयवाः इन्द्रयवः । शीघ्रं धान्यशीतकषाय- पानं योगजनितपित्तोद्रेकानुत्पत्त्यर्थम् । तत्फलं प्राह-दाहेत्यादि । स्पष्टम् । ५७–६२। इति हिंगुलविज्ञानीयो नाम नवमस्तरङ्गः भा.टी.—शुद्ध हिंगुल को धत्तूरमूलस्वरस से सात भावना देकर सुखालें । अब इसमें हिंगुल के बराबर सुहागा मिलाकर बारीक चूर्ण करलें । इसको रसशास्त्रज्ञ "श्रीसिद्धहिंगुलेश्वर" कहते हैं । इसमें से आधी रत्ती प्रमाण मात्रा में लेकर इसमें शुण्ठी, मोचरस तथा इन्द्रजौ का चूर्ण मिलाकर सेवन करायें, इसके पश्चात् अनुपान के रूप में धनिये का शीत कषाय पिलायें । इसके प्रयोग से दाह, मूर्च्छा, तृषा आदि उपद्रव नष्ट हो जाता है । यह रस पाचक तथा दीपक है । इसके प्रयोग से अनियमित नाड़ी नियमित हो जाती है। इसके अति- रिक्त यह रस ज्वरनाशक, कृमिनाशक, कफ स्रावक और साधारण रूप से ग्राही है । यह कोष्ठ में प्रकुपित वायु का शमन करता है और अपान वायु का अनु- लोमन करता है । सारांश यह है कि ज्वरातिसार रोग के लिये संसार में इस रस के समान कोई दूसरी औषधि नहीं है ॥ ५७–६२ ॥ यह हिंगुलविज्ञानीय नाम नवमतरङ्ग समाप्त हुआ चपलः गौरः श्वेतोऽरुणः कृष्णश्चपलस्तु चतुर्विधः । हेमाभश्चैव ताराभो विशेषाद्रसबन्धनः ॥ १ ॥ शेषौ तु मध्यौ लाक्षावच्छीघ्रद्रावौ तु निष्फलौ । वंगवद् द्रवते वह्नौ चपलस्तेन कीर्तितः ॥ २ ॥ चपलो लेखनः सिद्धो देहलोहकरो मतः । रसराजसहायः स्यात् तिक्तोष्णमधुरो मतः ॥ ३ ॥ चपलः स्फटिकच्छायः षडस्री स्निग्धको गुरुः । त्रिदोषघ्नोऽतिवृष्यश्च रसबन्धविधायकः ॥ ४ ॥ महारसेषु कैश्चिद्धि चपलः परिकीर्तितः । जम्बीरकङ्कोटकशृङ्गवेरैर्विभावनाभिश्चपलस्य शुद्धि॥ ५ ॥ चपलस्य सत्त्वपातनम् शैलं तु चूर्णयित्वाथ धान्याम्लोपविषैर्विषैः । पिण्डं बद्ध्वा तु विधिवत् पातयेच्चपलं तथा ॥ ६ ॥ ( इति रसरत्नसमुच्चयात् )
२१० रसतरङ्गिणी कविराजनरेन्द्रनाथमित्रकृतः चपलनिर्णयः दुर्देववशादायुर्वेदेष्वज्ञाता विद्वांसो नोपलभ्यन्त अद्यत्वे । न चाप्यस्ति काचि- त्संसद् या ह्यभिधेयेषु नियंत्री स्यात् । फलञ्चास्य यद् बहूनि द्रव्याणि सन्दिग्ध- कोटिष्वज्ञातकोटिषु वः स्थाप्यन्ते । किमधिकम्, तेष्वेव द्रव्येषु चपलोऽप्येवम् । न चायुर्वेदसरणिमनुसृत्य जीवितदातारो भिषजश्चपलमुपयुञ्जतेऽधुना। चपलस्या- नवबोध एव तत्र हेतुः । इदानीं यावन्नात्र विषये केनापि तत्त्वं प्रकाशितम् । यत्किमपि श्रूयते मन्दवाचोच्यमानं न मनःप्रीणनं तत् । केचित्तं "बिस्मथ" इत्यामनन्ति, तदसाम्प्रतम् । नहि चपलरूपः सः, न च तत्र चपलाश्रिता गुणाः। चपलः किं वस्तु इति निर्णायोक्तेः प्राग् अस्य स्वरूपे गुणेषु चावहितमनसा भवितव्यम् । प्राचीनेषु रसत्तन्त्रेष्वेक एनं महारसेष्वन्ये च साधारणरसेषु पठन्ति ! सोमदेवकृतरसेन्द्रचूडामणौ यथा— "कम्पिल्लश्चपलो गौरीपाषाणो नवसारकः । कपर्दो वह्निजारश्च गिरिसिन्दूरहिंगुलौ ॥ मृद्दारशृङ्गमित्यष्टौ साधारणरसाः स्मृताः ॥ रसार्णवे महारसेष्वयं परिगणितः— "माक्षीको विमलः शैलश्चपलो रसकस्तथा । सस्यको दरदश्चैव स्रोतोऽञ्जनमथाष्टमम् ॥ अष्टौ महारसाः................................॥” तथैवान्येषु तन्त्रेष्वपि । रसरत्नसमुच्चये तु— “अभ्रवैक्रान्तमाक्षीकविमलाद्रिजसस्यकम् । चपलो रसकश्चेति ज्ञात्वाष्टौ संग्रहेद्रसान् ॥” इत्यनेन महारसेष्वस्य परिगणनं विधायाग्रे आचार्याणामत्र विकल्पः स्वयमेवोक्तः— “महारसेषु कैश्चिद्धि चपलः परिकीर्तितः ।” इत्यनेन । ग्रन्थसन्दर्भतत्त्वमिदं तु तन्त्रान्तरादेव याथातथ्येनोद्धृतं ग्रन्थकर्त्रा । अन्यथा— स्वयमेव महारसेषु संख्याय महारसेष्वित्यादिवचनमसङ्गतम् । उपरसास्तु गन्धा- श्मेत्यादिना तत्र पृथगुक्ता एव । स्यान्नाम चपलः साधारणरसो वा महारसो वा, नात्र विवेचनीयः सः । न चाप्यस्त्यस्मत्सन्निधौ कश्चिन्निकषग्रावा यत्र हि साधारणरसत्वं महारसत्वं वा परीक्ष्येत ।
चपलनिर्णयः २११ "गौरः श्वेतोऽरुणः कृष्णश्चपलस्तु चतुर्विधः । हेमाभश्चैव ताराभां विशेषाद्रसबन्धनः ॥ शेषौ तु मध्यौ लाक्षावच्छीघ्रद्रावौ तु निष्फलौ ॥" "वङ्गवद् द्रवते वह्नौ चपलस्तेन कीर्तितः । चपलः स्फटिकच्छायः षडस्री स्निग्धको गुरुः ॥" समुपलभ्यमानानि सर्वाणि तन्त्राण्यत्रैकमत्यं त्तमेवोद्घोषयन्ति । अत उक्तमेव स्वरूपं निर्णायकं प्रमाणं च । नात्रास्ति कश्चिद्विसंवादो यद्द्रव्यं गौरादिभेदेन चतुर्विधं वङ्गवद् द्रुतिशीलं वह्नौ, स्फटिकच्छायं, षडस्रि, गुरु च स चपलः । न चेदं स्वरूपमेकान्तेन बिस्मथधातौ, अन्वेषयद्भिश्चास्माभिः सेलिनियम (Selenium) द्रव्ये स्वरूपमिदं दृष्टम् । तथा चेदमस्माकमध्यवसायो यच्चपलः सेलिनियम एव । उक्तं च स्वरूपवर्णने सेलिनियमस्य— "Colour and properties—Steel-grey, non-metallic rods or buttons; very high lustter crystalline surface on being broken. Also occurs in the form of dark- red crystals or powder, soluble in carbon disulphide and melting between 170° and 180° C. Burns in air with a bluish red flame forming selenium dioxide," अस्यायमभिप्रायः—तीक्ष्णलोहाभधूम्रवर्णः, अधात्वीयशलाकासंस्थानः कुचेलकाकृतिर्वा, अतितीक्ष्णकान्तिश्चाकचिक्याढ्यः, त्रोटिते च पुष्पाकारोपरितलो भवति सेलिनियमः । पश्यन्तु समत्वम्—१. गौरश्चपलः, अत्र तीक्ष्णलोहाभधूम्रवर्णत्त्वं गुणः । धूम्रवर्णश्च श्वेतकृष्णवर्णयोः सङ्गमेन जायते । नतु गौरः श्वेतस्तत्र । श्वेतवर्ण- चपलस्य पृथगेव पाठात् । २. चपलः स्फटिकच्छायो भवति । अत्र च अधा- त्वीयशलाकाकृतिसंस्थान इत्यारभ्य पुष्पाकारोपरितल इति पर्यन्तं तस्यैव व्याकरणमात्रम् । तथा अयं च गाढरक्तवर्णोऽप्युपलभ्यते पुष्पाकृतिना चूर्णरूपेण वा, स च कोकिलद्विगन्धिकिते विलीनो भवति । सप्तत्युत्तरशतादशीत्युत्तरशतं यावदंशं शतांशतापमानयन्त्रस्य विद्रवीभवति तारल्यमुपलभ्यते वा । स च नीलिममिश्रि- तेन रक्तेनार्चिषा ज्वलन् वायौ सेलिनियमं द्व्यंापजनीयमापादयति । अत्रोक्तेन गाढरक्तवर्णेनारुणवर्णचपलस्य साम्यं स्पष्टम् । तथा च द्रुतिशी- लत्वमपि सदृशो गुणः ।