रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें१३ अष्टमस्तरङ्गः १६३ ततः प्रज्वालयेदू युक्त्या गन्धो द्रवति बिन्दुशः । इदं सौगन्धिकं तैलं बुधैः श्रेष्ठतरं मतम् ॥ १०१ ॥ बिन्दुत्रयमितं तैलं ताम्बूलीदलसंस्थितम् । तत्समं विमलं सूतं संमद्यौथ प्रयोजयेत् ॥ १०२ ॥ दिनत्रयप्रयोगेण दीपयत्युदरानलम् । आमं निवारयत्येव दिनैकमपि योजितम् ॥ १०३ ॥ कासश्वासहरः कामं ग्रहणीगजकेशरी । आमवातादिरोगघ्नः स्नेहोऽयं गन्धसम्भवः ॥ १०४ ॥ कलाः षोडश । कलांशं षोडशांशम् । सूतसंमर्दनात्कज्जली भवति, ततः प्रयोज्यम् ॥ ९६-१०४ ॥ भा.टी.—गन्धकचूर्ण में सोलहवाँ भाग त्रिकटुचूर्ण मिला एक स्वच्छ कपड़े पर फैला दें और इसकी बत्ती बनाकर बत्ती को तागे से अच्छी तरह बांध दें। अब इस बत्ती को तीन घण्टे तक सरसों के तेल में भिगो दें, तीन घंटे के बाद निकाल चिमटे से एक तरफ पकड़ कर आगे को कुछ नीचे को झुकाकर इसके नीचे कांच का प्याला रख दें और बत्ती को जलाकर पकड़े रहें । इस प्रकार बत्ती जलाने से गन्धक पिघलकर बिन्दु-बिन्दु रूप से प्याले में गिरेगा। उसे गन्धकतैल कहते हैं । इस तैल में से तीन बूँद लेकर इसके बराबर भाग शुद्ध पारद को एकत्र खरल में पान के पत्तों के रस के साथ अच्छी तरह मर्दन कर कज्जली-सी बना लें । इसके तीन दिन अन्तः प्रयोग करने से पाचकाग्नि तीव्र हो जाती है और पेट में सञ्चित आमदोष एक दिन में ही दूर होजाता है। यह तैल कासश्वासहर,ग्रहणीरोगनिवारक और आमवात आदि रोगनाशक है । ६६ गन्धकतैलस्य चतुर्थो निर्माणप्रकारः ब्रह्मबीजोद्भवं श्लक्ष्णचूर्णं क्षिपेच्छागदुग्धे ततः शोषयेद्युक्तितः । षोडशांशं बलिं तत्र सम्मेलयेत् काचकूप्यां ततो विन्यसेत्कोविदः ॥१०५॥ ततः पातालतन्त्रेण तैलं ग्राह्यं भिषग्वरैः । सत्त्वभूतं गन्धकस्य गन्धतैलं महोत्तमम् ॥ १०६ ॥ रक्तिद्वयं गन्धतैलं ताम्बूलोदलमध्यगम् । तैलाईं रसराजन्तु शुद्धं तत्र विमिश्रयेत् ॥ १०७ ॥ अङ्गुल्यग्रेण संमर्द्य कृत्वा कज्जलिकां चरेत् । ताम्बूल शीलयेत्पश्चाद् गन्धतैलस्य सेवकः ॥ १०८ ॥