रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ रसतरङ्गिणी विशुद्धो गन्धकद्रावः सुधाधिकफलप्रदः । अविशुद्धो दोषकारी तस्मात्तं शोधयेद् बुधः ॥ १२० ॥ भा. टी—शुद्ध गन्धकद्राव प्रयोग करने में अमृत के समान गुणकारी होता है, किन्तु अशुद्ध का प्रयोग अनेक हानिकारक होता है । अतः इसको शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिये ॥ १२० ॥ अथ गन्धकद्रावस्य शोधनप्रकारः गन्धकद्रावकं प्राज्ञः काचकुप्यां निधापयेत् । अस्यां संयोज्य नलिकां मुखमस्या नियोजयेत् ॥ १२१ ॥ अन्यस्यां काचकुप्यान्तु पचेन्मृद्वग्निना भिषक् । तस्य तृतीयमंशन्तु जलांशमधिकं भवेत् ॥ १२२ ॥ तस्मात्तं प्रथमं यत्नादस्मादपनयेद् भिषक् । विशुद्धं गन्धकद्रावं ततः कुप्यां निपातयेत् ॥ १२३ ॥ पात्रगं नागदोषं यज्जलांशमधिकञ्च यत् । गन्धद्रावो जहात्येवं निर्मलञ्च परं भवेत् ॥ १२४ ॥ अथास्यापि शोधनावश्यकतेति तच्छोधनप्रकारमाह । गन्धकद्रावमिति-अत्र बलिद्रावेऽधिकांशजलशोषः नागसंपर्कजन्यदोषलयश्च भवतीति । स्पष्टमन्यत् ॥ १२१-१२४ ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त प्रकार से बनाये हुये गन्धकद्राव को एक कांच की बन्द मुखवाली शीशी में डालकर इसमें एक कांच की नली लगा दें और इस नली के दूसरे मुख को एक दूसरी रिक्त कांच की शीशी में जोड़कर नीचे मन्द-मन्द अग्नि (सुरादीप की अग्नि) जलायें । जब गन्धकद्राव वाली शीशी में से दो भाग जल स्रवित होकर दूसरी रिक्त शीशी में आ जाय तो अग्नि देना बन्द करके तृतीयांश जल भाग शीशी में ही छोड़ दें । इस प्रकार गन्धकद्राव में जो अधिक जल तथा सीसकदोष का अंश होता है वह सब दुबारा गन्धकद्राव को उड़ा लेने से नहीं रहने पाता है और गन्धकद्राव निर्मल हो जाता है ॥१२१-१२४॥ पानार्थे सजलगन्धकद्रावस्य निर्माणप्रकारः शीतांशभागकं शुद्धं गन्धकद्रावकं शुभम् । परिस्रुते तु सलिले रविभागमिते क्षिपेत् ॥ १२५ ॥ निधाय काचकुप्याञ्च विमलायां भिषग्वरः । दृढेनाथ पिधानेन रोधयेत् कूपिकामुखम् ॥ १२६ ॥