रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टमस्तरङ्गः १८५ अपरस्मिन् सोरकञ्च सार्द्धद्वितोलकोन्मितम् । निधाय चुल्ल्यामारोप्य वह्निं सन्धुक्षयेत्ततः ॥ ११४॥ पिधानेनानयोर्युक्त्वा भृशं संरोधयेन्मुखम् । नालिकाद्वितयं दीर्घं पात्रयोर्योजयेत् पृथक् ॥ ११५ ॥ कोष्ठागारेऽहिपात्रे च मुखं नलिकयोर्न्यसेत् । बलिसोरकयोरेवं धूमं सम्मिश्रयेद् बुधः ॥ ११६ ॥ दशाधिकद्विशतकपलं सलिलमाहरेत् । पात्रेऽन्यस्मिंश्च संस्थाप्य वह्नौ सन्तापयेत् भृशम् ॥ ११७॥ नालिकामुखतो बाष्पं नागपात्रेऽथ मेलयेत् । बाष्पसंयोगतश्चैव शतत्रयपलोन्मितः ॥ ११८ ॥ जायते गन्धकद्रावः पीताभोऽतिमनोहरः । अथ नव्यपरिभाषासम्मतो बलिद्रावः—एकस्मिन्निति । पात्रयोः वलिपात्रे सोरकपात्रे च । कोष्ठागारे इति कद्व्यागारे । अहिपात्रे सीसकनिर्मिते पात्रे । स्पष्टमन्यत् ॥११३-११८॥ भा.टी.—एक लोहे के पात्र में सौ पल शुद्ध गन्धक डालकर इसको चूल्हे पर रखकर अग्नि दें, इसी तरह एक दूसरे लोहपत्र में साढ़े छः पल सोरा डाल कर चूल्हे पर रख अग्नि दें । अग्नि पर रखने के पूर्व इन दोनों के मुखों को पृथक्-पृथक् अच्छी तरह बन्द कर दें और दोनों पात्रों के मुख पर छिद्र करके एक एक लम्बी नली फिट करके इन दोनों नलियों के मुखों को एक कुप्पी के आकार के सीसे के पात्र में जोड़ दें जिससे सोरक और गन्धकवाले पात्र से बाष्प उड़कर सीसे के पात्र में इकट्ठा हो जाय । अब एक अर्क निकालने वाले साफ भभके में दो सौ दस पल जल भरकर इसके मुख को भी बन्द कर एक नली लगाकर इस नली को भी उक्त सीसे के पात्र के मुख में जोड़ दें, इस तरह तीन नलियों का मुख एक पात्र में जोड़ने से बाष्प जमकर जल के रूप में पात्र के अन्दर तीन सौ पल परिमाण में इकट्ठा हो जायगा । यही सुन्दर पीताभ वर्ण का गन्धकद्राव कहा जाता है ॥११३-११८॥ गन्धकद्रावस्य नामानि गन्धद्रावो बलिद्रावो गन्धाम्लश्च स कीर्तितः ॥ ११९ ॥ भा.टी.—गन्धकद्राव को गन्धद्राव, बलिद्राव तथा गन्धकाम्ल (Sulphu- ric acid) कहा जाता है ॥११९॥