रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 241, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवमस्तरङ्गः २०१ भा.टी.-अशुद्धहिंगुल सेवन करने से बुद्धिभ्रम, प्रमेह रोग, चित्तविभ्रम, आँखों के सामने अँधेरा आना, बिना श्रम के थकावट अनुभव होना और शरीर में दुर्बलता रूप विकार हो जाते हैं, अतः हिंगुल को शुद्ध करके प्रयोग में लाना चाहिये ॥ ११ ॥ अथ हिंगुलशोधनस्य प्रथमः प्रकारः हिंगुलं चूर्णितं खल्वे शृंगवेराम्भसा ततः । सप्तधा भावयेत्प्राज्ञो निर्मलो हिंगुलो भवेत् ॥१२॥ शृङ्गवेरं आर्द्रकम् तत्तद्रसभावनाय च संयोगजविजातीयगुणान्तरोत्पत्त्या पूर्वदोषप्रध्वंसः । स चानुभवसाध्य इति प्राञ्चः । औषधबलाबलापेक्षया च एकधाऽनेकधा वा भावना ॥ १२ ॥ भा.टी.-हिंगुल को खरल में डालकर पीसें और इसको अदरक के रस की सात भावना देकर सुखा लें तो वह शुद्ध हो जाता है ॥ १२ ॥ वक्तव्य-अदरखरस या नीबूरस आदि से हिंगुल को भावना देकर अंत में उसमें जल भर दें, जब जल मात्र ऊपर आ जाय तो उस जल को अलग कर दें, नीचे के हिंगुल को सुखाकर काम लावें । जल से बिना धोये ही काम में लाने से दोषों का निर्हरण अच्छी तरह नहीं होता । द्वितीयः शोधनप्रकारः हिंगुलं चूर्णितं खल्वे लकुचस्याम्भसा ततः । विभाव्य शोषयेद् वैद्यो हिंगुलः शुद्धिमाप्नुयात् ॥१३॥ लकुचस्याम्भसाऽपि सप्तधा भावना विधेया ॥ १३ ॥ भा.टी.-हिंगुल को खरल में चूर्ण करके बड़हड़ के जल से सात भावना देकर सुखा लेने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ १३ ॥ तृतीयः शोधनप्रकारः सुचूर्णितं हिंगुलन्तु मेषीदुग्धेन भावयेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धमायात्यनुत्तमाम् ॥१४॥ अम्लवर्गोक्तभैषज्यैर्भावितः सप्तधा पुनः । हिंगुलः परमां शुद्धिमाप्नोतीति किमद्भुतम् ॥१५॥ मेषीदुग्धभावितस्य पुनरम्लवर्गभावनया गुणवृद्धिश्च भवतीति । तदेतदाहुः- “मेषीक्षीरेण दरदमम्लवर्गैश्च भावितम् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चि- तम् ॥” इति ॥ १४-१५ ॥