भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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२०० रसतरङ्गिणी स्थालीं सम्भ्राम्य परितो यत्नेन रोधयेन्मुखम् । ततः संस्थापयेच्चुल्यां वह्निं दद्याच्छनैः शनैः ॥६॥ अधःस्थालीकण्ठसंस्थं हिंगुलं तु समाहरेत् । ऊर्ध्वस्थालीतलस्थञ्च पुनः पक्त्वा समाहरेत् ॥१०॥ कृत्रिमहिंगुलनिर्माणप्रकारः—गन्धकस्याष्टौ भागाः, पारदस्य द्विचत्वारिंशद् भागाः, मृदङ्गयन्त्रं प्रागुक्तम् । वारङ्गं हस्तकम् । अधःस्थालीकण्ठलग्नं गन्धक- स्याल्पत्वात् मृदुतरम् । ऊर्ध्वस्थालीतलस्थं तु गन्धकस्य प्राचुर्य्यात्कठिनतरम् । तस्मात्तस्य पुनः पाकावश्यकता अवशिष्टगन्धकजारणद्वारा मार्दवसम्पादनाय । सोऽयं हिंगुलनिर्माणप्रकारः साम्प्रतं प्रचलितः । प्राञ्चस्तु वालुयन्त्रद्वारा हिंगुलनिर्माणमाहुः तत्तु बहुलायाससाध्यत्वात् दुष्करमिति स प्रकार उपेक्षित आचार्यैः ॥ ५–१० ॥ आ.टी.—आठ भाग गन्धक और बयालीस (४२) भाग पारद लेकर इसको पूर्वोक्त मृदंगयंत्र डालकर इसके वारंग (Handle) को घुमा दें । इसके घूमने से दबाव पड़ने के कारण पारद गन्धक का चमकीला बारीक चूर्ण हो जायगा । तब ढक्कन को घुमाकर अलग करके यन्त्र में से धूसरवर्णभ चूर्ण को निकाल करके उसे एक ऐसी स्थाली (पात्र) में रखें जिसके मुख पर बाहर की तरफ से गोल रेखायें (ढक्कन फिट करने के लिये चूड़ियाँ) बनी हों । अब इस स्थाली के मुख में एक दूसरी स्थाली, जिसके मुख पर भी रेखायें बनी हों, औंधी मुख जोड़कर (घुमाकर फिट करके सन्धिस्थल को अच्छी तरह) बन्द कर दें । अब इस यन्त्रको चूल्हे पर रखकर धीरे-धीरे अग्नि जलायें । अग्नि शान्त होने पर स्वांगशीत यन्त्र को खोलकर नीचे की स्थाली के कण्ठप्रदेश में लगे हुये कोमल हिंगुल को निकालें । और ऊपर की स्थाली के तल में जमे हुये कठोर हिंगुल को कोमल करने के लिये पुनः उसी प्रकार से पकाकर कोमल बना निकाल लें ॥ ५–१० ॥ अशुद्धहिंगुलस्य दोषाः अशुद्धो हिंगुलो मोहं प्रमेहं चित्तविभ्रमम् । आन्ध्यं क्लमं तथा क्लैब्यं कुर्य्यात्तस्माद्विशोधयेत् ॥११॥ अथाशुद्धहिंगुलदोषाः—मोहं धीविभ्रमम् । चित्तविभ्रमं तमस उद्रेकात् भ्रान्तिम् । क्लमः अनायासजातः श्रमो देहेन्द्रियम्लानताहेतुः । क्लैब्यं दुर्बल- तामिति यावत् । तस्मात् उक्तव्याधिहेतुत्वादित्यर्थः ॥ ११ ॥