रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 246, कुल 799 में से
संदर्भ में पढ़ें२०६ रसतरङ्गिणी अथ श्रीसिद्धदरदामृतः—कर्षद्वयमितं चतुस्तोलकम् । एकमेवैतादृशं खण्डं ग्राह्यं पाकयोग्यत्वात् न चूर्णितम् । अम्बरीषं घटादिखर्परं पक्वकपालं क्षुद्रकटाहं वा । उपर्युपरिचयनं स्तूपाकारतया । देवपुष्पं लवङ्गम् । दह्यमानेषु भल्लातकेषु साधकस्तत्र न तिष्ठेदेकत्र भल्लातकधूमस्पर्शान्मुखादिशोथाशंका । ऊरुस्तम्भपञ्च- वधसन्निपातशीतांगसन्निपातेषु भल्लस्य द्विशततमोऽशः रक्तिकायां मात्रायामेकस्यां सम्मिश्र्य गव्यपयोऽनुपानेन दातव्यः, आमवाते पुराणेन गुडेन सह । पयोऽनु- पानेन क्लैब्ये ताम्बूलदलादिभिः सह विविच्य स्पष्टमन्यत् ॥ ३६-४५ ॥ भा.टी.—चार तोले की एक शुद्ध हिंगुल की डली लेकर उसको चारों तरफ से तागे से खूब अच्छी तरह लपेट लें । अब इसको एक छोटी सी कड़ाही अथवा मिट्टी के कड़ाही सदृश पात्र में रखकर चूल्हे पर रख दें । और कड़ाही में दो पल परिमाण प्याज का स्वरस और एक कर्ष परिमाण बड़ का दूध डाल कर चूल्हे में अग्नि जलायें । जब जलीयांश सूख जाय तो कड़ाही को नीचे उतार ठण्डा होने पर सिंगरफ के टुकड़े को निकाल कर फिर उस कड़ाही को अच्छी तरह साफ करके चूल्हे पर चढ़ा दें और इसमें दो तोले लौंग का चूर्ण डालकर इसके ऊपर अच्छी तरह से सिंगरफ के टुकड़े को टिका दें। फिर इसके ऊपर पच्चीस तोले भिलावा फलों को इस तरह रखें जिससे ऊपर को पतला नोकदार और नीचे को चौड़ा आकार ( जैसा बाजार में टोकरियों पर लगाया हुआ आटा होता है ) बन जाय । अब भल्लातकफलों के बीच के छिद्रों को लौंग के चूर्ण से अच्छी तरह बन्द कर दें और जलाकर पकायें । जब भिलावे जल जायँ तब इनको बीच में से हटाकर इनमें हिंगुल से दशगुणा अधिक घृत थोड़ा-थोड़ा करके डालते हुये इसे भी जला लें । अब कड़ाही को नीचे उतार ठण्डा करके सिंगरफ को तागों से पृथक् करके अच्छी तरह पोंछकर खरल में पीस लें । इस योग को पहिले शिवजी ने सिद्ध लोगों को दिया था । अतः यह योग संसार में सिद्धदरदामृत नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ३६-४५ ॥ अथास्य गुणाः ऊरुस्तम्भं त्वामवातं तथा पञ्चवधाह्वयम् । शीताङ्गसंज्ञकञ्चापि सन्निपातं सुदारुणम् ॥ ४६ ॥ प्लीहोदरं दीर्घकालजातं दोषत्रयोत्थितम् । क्लैब्यञ्च नाशयत्याशु श्रीसिद्धदरदामृतः ॥ ४७ ॥