भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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नवमस्तरङ्गः २०७ वैशिष्ट्यादनुपानानां करोति विविधान् गुणान् । मात्रयोचितया दत्तो रोगसंघञ्च नाशयेत् ॥ ४८ ॥ भा.टी.—यह दरदामृत योग, ऊरुस्तम्भ, आमवात, पक्षाघात में विशेष लाभदायक है। शीतांग-सन्निपात में यह विशेष लाभदायक माना जाता है। इसके अतिरिक्त पुरानी सान्निपातिक प्लीहावृद्धि तथा भयंकर नपुंसकता को यह शीघ्र ही दूर करता है। विशेष-विशेष अनुपानों के साथ प्रयोग करने पर यह अनेक गुणदायक औषधि है। यदि उचित मात्रा में देश-काल आदि का विचार से प्रयोग किया जाय तो अनेक रोगों को दूर करता है ॥ ४६-४८ ॥ अस्य मात्रा गुञ्जार्धसंमिता त्वस्य पूर्णमात्रा प्रशस्यते । बलकालादिकं वीक्ष्य ह्रासयेच्चाथ वर्द्धयेत् ॥ ४६ ॥ भा.टी.—दरदामृत की मात्रा आधी रत्ती की पूर्ण मात्रा समझनी चाहिये । रोगी के बल और काल आदि को देखकर मात्रा में अधिकता या न्यूनता भी की जा सकती है ॥ ४६ ॥ हिंगुलीयो माणिक्यरसः विशोधितं हिंगुलञ्च तोलकाष्टकसंमितम् । सौगन्धिकञ्च तत्तुल्यं तथा शैलूषभूषणम् ॥ ५० ॥ पलाशपुष्पस्वरसैः पेषयेद्दिनसप्तकम् । शोषयित्वा रसञ्चाथ विदध्यात् श्लक्ष्णचूर्णकम् ॥ ५१ ॥ काचकूप्यां निधायाथ वालुकायन्त्रमध्यगम् । क्रमवृद्ध्यानलेनात्र पचेद् वै दिवसत्रयम् ॥ ५२ ॥ स्वतः शीतं ततो ज्ञात्वा कूपिकाकण्ठसंस्थितम् । रससिन्दूरसंकाशं माणिक्यरसमाहरेत् ॥ ५३ ॥ हिंगुलीयो माणिक्यरसः—शुद्ध हिंगुलं ८ तो०, गन्धकं ८ तो०, हरिताल ८ तो०, माणिक्यमिति कान्तिमत्तया संज्ञा ॥ ५०-५३ ॥ भा.टी.—शुद्धहिंगुल आठ तोला, शुद्ध गन्धक तथा हरिताल आठ-आठ तोला लेकर इनको खरल में एकत्र करके ढाक के फूलों के स्वरस के साथ सात दिन तक मर्दन करके अच्छी तरह सुखाकर बारीक चूर्ण करके कपड़मिट्टी की हुई काँच की शीशी में भरकर वालुकायन्त्र में रख के मन्द, मध्य तथा तीव्र अग्नि से तीन दिन तक पकावें । जब वालुकायन्त्र स्वांगशीतल हो जाय तो कूपी के प्रदेश में लगे हुये रससिन्दूर के सदृश वर्ण के माणिक्य रस को निकल लें ॥ ५०-५३ ॥