रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ रसतरङ्गिणी भा.टो.—श्वेताभ्र, रक्ताभ्र, कृष्णाभ्र, पीताभ्र, भेद से चार प्रकार का होता है। इन चारों में से कृष्णाभ्रक रोगनाशक होता है ॥ ३ ॥ वक्तव्य—आजकल यद्यपि श्वेताभ्रक का भी बहुत से वैद्य प्रयोग करने लगे हैं, परन्तु यह कृष्णाभ्रक की अपेक्षा बहुत अल्पगुण होने से प्राचीन काल में प्रसिद्ध नहीं था। अतएव इसके गुणादि का वर्णन शोधन का वर्णन पूर्ण रूप से नहीं मिलता है। कृष्णाभ्रकस्य भेदाः पिनाकनागमण्डूकवज्राह्वयविभेदतः। चतुर्विधन्तु कृष्णाभ्रं मतं रसविशारदैः ॥४॥ भा.टी.—पिनाक, नाग, मण्डूक तथा वज्र भेद से कृष्णाभ्रक के चार भेद होते हैं ॥ ४ ॥ अग्नौ सन्तापितं यत्तु दलानि परिमुञ्चति। रसतन्त्ररहस्यज्ञैस्तत् पिनाकं प्रकीर्तितम् ॥ ५ ॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने से सूक्ष्म दलों (पत्र) को छोड़ने लगता है उसे रसतन्त्रकार पिनाक नामक कृष्णाभ्रक कहते हैं ॥ ५ ॥ तस्य दोषाः पिनाकाभ्रं मलं रुद्धवा कुरुते मरणं ध्रुवम्। कुष्ठादिकान्महारोगान् जनयत्यपि निश्चितम् ॥६॥ भा.टी.—पिनाक नामक कृष्णाभ्रक सेवन करने पर तीव्र मलबन्ध करके मृत्यु का कारण होता है। इसके अतिरिक्त कुष्ठ, भगन्दर, प्रमेह, अर्श आदि महारोगों को भी उत्पन्न करता है ॥ ६ ॥ नागाभ्रकस्य लक्षणम् पावकोत्तापितं यत्तु फूत्कारं परिमुञ्चति। क्रुद्धाहिश्वासवच्छीघ्रं नागाभ्रं तदिहोच्यते ॥७॥ भा.टी.—जो अभ्रक अग्नि में तपाने पर सहसा कुपित सर्प की भांति फूत्कार शब्द करने लगता है उसे नाग अभ्रक कहते हैं ॥ ७ ॥ तस्य दोषाः नागाभ्रं सेवितं कुर्यान्महाघोरं भगन्दरम्। मण्डलं वा महाकुष्ठं तद्द्वयं वा न संशयः ॥८॥